अब देखते हैं ‘सरकार’ का ‘जीरो टोलरेंस’

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कोई माने या ना माने पर यह हकीकत है कि अभी तक उत्तरखण्ड को सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम ने पहुंचाया है l राज्य के तंत्र को भ्रष्ट बनाने और अफसरों- नेताओ-ठेकेदारों के नापक गठजोड़ के लिए यह संस्था बड़ी ज़िम्मेदार है l

बीते रोज आयकर विभाग के एक छापे के बाद इसका खुलासा तो हुआ है, लेकिन भ्रष्टाचार पर जीरो टोलरेंस का दावा करने वाली सरकार अब क्या एक्शन लेती है यह अभी साफ नहीं है l

पिछले एक दशक से यूपी राजकीय निर्माण निगम, उत्तराखंड पर ‘राज’ कर रहा है । हर शासनकाल में नेता अफसरों का इसे खुला संरक्षण मिलता रहा है। आलम ये है कि प्रदेश में शौचालय बनाने से लेकर बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण और आपदा पुनर्निर्माण के कार्यों से लेकर वेबसाइट बनाने तक का काम इसे मिला है।

मोटे आंकलन के मुताबिक उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को इन वर्षों में कई हजार करोड़ रुपये का काम मिला, जिसमें से राजकीय निर्माण निगम के अफसरों, ठेकेदारों, प्रदेश के आला नौकरशाहों और सफेदपोशों के गठजोड़ ने सैकड़ों करोड़ के वारे न्यारे किए।

तमाम बार मसला उठने के बावजूद न निगम को काम मिलने बंद हुए, न उत्तराखंड को बर्बाद करने वाले अफसर, ठेकेदारों का कुछ बिगड़ा। इनकम टैक्स के एक छापे ने और कुछ हो न हो, लेकिन राजकीय निर्माण निगम के अफसरों, ठेकेदारों, प्रदेश के नौकरशाहों और सफेदपोशों के गठजोड़ पर से पर्दा जरूर उठा दिया है।

बीते रोज आयकर विभाग के छापे में यूपी निर्माण निगम के महाप्रबंधक एसए शर्मा के देहरादून के जिन ठिकानों पर छापेमारी हुई, उसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस अधिकारी ने कितनी अकूत संपति जुटाई है। दून में 100 बीघे का फार्म हाउस और राजपुर रोड के पॉश इलाके में शानदार बंगला देख कर शायद ही किसी को यकीन होगा कि यह एक मामूली महाप्रबंधक की संपत्ति होगी।

इनके अंदर के तामझाम का तो अंदाजा लगाना ही मुश्किल है। दरअसल ये महाप्रबंधक उस निर्माण कंपनी का है जो एक दशक से उत्तराखंड को खोखला करने में लगी है। आयकर विभाग के छापे में जिस दूसरे शख्स, ठेकेदार के यहां छापेमारी हुई, उसका और राजकीय निर्माण निगम का या यूं कहें कि, निगम के महाप्रबंधक का सीधे संबंध हैं। इस ठेकेदार पर आला अफसरों की जबरदस्त मेहरबानी रही है।

सिडकुल से लेकर केदारनाथ आपदा पुर्ननिर्माण कार्यों तक में इस ठेकेदार को सैकडों करोड़ों रुपये के काम मिले। ठेकेदार के मुनाफे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिडकुल और केदारनाथ में निर्माणकार्य निपटाने के बाद यह ठेकेदार एक न्यूज चैनल खड़ा कर देता है, जो कि खुद में बड़े निवेश का प्रमाण है।

न्यूज चैनल में एक बड़े नौकरशाह की पत्नी का कर्ताधर्ता की भूमिका में होना , जो अपने आप में ठेकेदार और नौकरशाह के बीच गठबंधन का प्रमाण है। हकीकत यह है कि चाहे एसए शर्मा हो या उनसे जुड़े ठेकेदार, उनकी जिस सल्तनत का खुलासा हुआ है, वह असल में उत्तराखंड की जनता की गाढ़ी कमाई है, जिसे नेता-अफसरों के गठजोड़ कर जालसाजी से हड़पा है। इनकम टैक्स का छापा सिर्फ छापे तक न रहकर इससे आगे बढ़ता है, तो निश्चित मानिए कि आने वाले दिनों में बेहद चौकानें वाले खुलासे होंगे।

तब शायद इस बात का भी खुलासा हो पाए कि केदारनाथ आपदा के बाद निर्माण कार्यों में नौकरशाहों और ठेकेदारों ने क्या-क्या गुल खिलाए, कैसे एक का एक हजार बनाया गया । सिस्टम इतना संवेदनहीन हो गया था कि आपदा प्रभावितों के लिए आई राहत की रकम फर्जी तरीके से हड़प डाली। सिडकुल में जो निर्माण कार्य हुए, उनमें किस तरीके से खेल हुआ। कैसे नौकरशाहों ने मनमाफिक तरीके से लूट खसोट की।

राजकीय निर्माण निगम के महाप्रबंधक की संपत्ति का खुलासा होने से इतना तो साफ हो गया है कि शर्मा की कुल संपत्ति इससे कई गुना ज्यादा होगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि यह संपति उत्तराखंड की उन्हीं परियोजनाओं से अर्जित की गई है, जिनमें करोड़ों रुपये की हेराफेरी हुई है। कार्रवाई अगर आगे बढ़ी, तो यह भी खुलासा होगा कि किन-किन बड़े नौकरशाहों से इसके तार जुड़े हैं।

सिलसिला यहीं खत्म नहीं होगा। जांच का दायरा बढ़ा तो सिडकुल के आला अधिकारियों से लेकर प्रबंध निदेशक और तमाम महकमों के आला अधिकारी और कांट्रेक्टर भी बेपर्दा होंगे। काश, भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ का दावा करने वाली त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार लोकायुक्त पास करा गई होती, तो इनकम टैक्स के एक्शन के आगे का खुलासा होने की कोई गुंजाइश बनती। जो लूट उत्तराखंड में पिछले सोलह सालों से मची है, उसका हिसाब किताब सामने आने का एक रास्ता बनता, लेकिन फिर भी सरकार के पास ‘जीरो टालरेंस’ दिखाने का एक मौका तो है, बशर्ते वह भी पूर्ववर्ती सरकारों की भांति उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम के ‘मोहपाश’ में न हो। बहरहाल, देखते हैं शायद अब दिखे त्रिवेन्द्र सरकार का दम !

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