मंत्री के ‘भड़काऊ’ बयान, ‘नासमझी’ या ‘चाल’ ?

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पहले ‘उत्तराखंड में रहना होगा तो, वंदे मातरम कहना होगा’ फिर ‘यदि प्रदेश के डिग्री कालेजों में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे तो प्राचार्य नपेंगे’ और उसके बाद यह कि ‘ प्रदेश के विश्वविद्यालयों को जेएनयू नहीं बनने दिया जाएगा’ एक के बाद एक उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत के इन तीन बयानों का क्या आशय निकाला जाए?

एक मंत्री यानी सरकार की ओर से आये इन बयानों कोई गंभीरता से लिया जाए तो मतलब यह निकलता है कि उत्तराखण्ड में राष्ट्रद्रोह पनप रहा है, प्रदेश के कालेज इसके केन्द्र बने हैं l

वाकई अगर ऐसा है तो सरकार की चिंता जायज है, लेकिन सच्चाई यह है उत्तराखण्ड में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती l हाल फिलहाल में भी राज्य में कहीं से इस तरह का कुछ सुनाई नहीं दिया, तो फिर क्या माना जाए 8क्या ये ना-समझी में दिए गए बे-मौसमी बरसात जैसे हैं या फिर सोची-समझी रणनीति के तहत दिए गए बयान? मंत्री जी ने यदि ये बयान बिना इनकी गंभीरता का आकलन किए केवल सुर्खियों में आने की हसरत से दिए हैं तो यह उनका हल्कापन है, और यदि उन्होंने सोच समझ कर सियासी नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए ऐसा कहा है तो यह बेहद चिंता का विषय है। दोनो ही स्थिति में यह माहौल को भड़काने वाले और असल मुद्दों से भटकाने वाले बयान हैं ।

मंत्री जी के वंदेमातरम वाले बयां को ही लो,चूंकि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है l लिहाजा उनके बयान के बाद विपक्ष का बयान भी आना ही था। अफसोसजनक है कि विपक्ष ने भी जवाब में भड़काऊ बात ही कही।

इसके चलते सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि पूरी बहस मूल मुद्दे से हट कर देशप्रेम और देशद्रोह के खांचे में बंट गई।बहरहाल, मंत्री के बयानों पर ही चर्चा की जाए तो उन्हें सुन कर तो ऐसा लग रहा है मानो उत्तराखंड में भारत से नहीं बल्कि पाकिस्तान से प्रेम करने वाले लोग रहते हैं।

ऐसा लग रहा है मानो यहां के डिग्री कालेजों में विद्यार्थी पाकिस्तान परस्ती सीख रहे हैं। सवाल यह है कि अगर उत्तराखंड में इस तरह के नारे वास्तव में लग रहे हैं तो फिर वे मंत्री जी के आलावा बाकियों को क्यों नहीं सुनाई दे रहे? सवाल यह भी है कि क्या मंत्री जी किसी एक विश्वविद्यालय का नाम बता सकते हैं, जहां इस तरह के नारे हाल-फिलहाल में सुनाई दिए हों? दूसरा अहम सवाल जेएनयू को लेकर है। बकौल मंत्री, प्रदेश के किसी भी विश्वविद्यालय को जेएनयू नहीं बनने दिया जाएगा, लेकिन आखिर क्यों?

क्या जेएनयू अछूत है? क्या जेएनयू विद्यार्थियोँ के लिए खतरनाक जगह है? जेएनयू, जिसकी ख्याति न केवल भारत में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है के बारे में ऐसा बयान देना, मंत्री जी के सतही ज्ञान तथा संकीर्ण सोच को दिखाता है। जेएनयू, जिसे कि इसी महीने की तीन तारीख को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में दूसरी रैंक दी है, के बारे में मंत्री जी का यह बयान कितना हास्यास्पद है, समझा जा सकता है। मंत्री जी को यह मालूम होना चाहिए कि जेएनयू का मतलब केवल वो ‘काला अध्याय’ नहीं है, जो सालभर पहले घटा था, बल्कि इसके मायने बहुत बड़े हैं। इस विश्वविद्यालय ने देश को राजनेता, शिक्षाविद, प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, रंगकर्मी तथा साहित्यकार समेत तमाम क्षेत्रों में नाम कमाने वाले बहुत से लोग दिए हैं।

अफसोस की बात है कि कहां तो देश के हर विश्वविद्यालय को जेएनयू से सीख लेनी चाहिए, और कहां मंत्री धन सिंह प्रदेश के विश्वविद्यालयों में जेएनयू की छाया तक पड़ते देखना नहीं चाहते। जहां तक प्रदेश में उच्च शिक्षा की स्थिति की बात है तो इसकी बदहाली किसी से छुपी नहीं हैं। प्रदेश में कुल 21 राज्य विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान हो।

इन विश्वविद्यालयों में गुणवत्ता की बात करना तो छोड़िए, बुनियादी जरूरतें तक ठीक से उपलब्ध नहीं हैं। कहीं प्राध्यापक नहीं है, तो कहीं विषय नहीं हैं। कहीं बिल्डिंग नहीं हैं, तो कहीं पुस्तकालय। विश्वविद्यालयों के बीच गुणवत्तापरक शिक्षा देने को लेकर नहीं बल्कि इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा है कि ज्यादा भ्रष्टाचार कौन कर पाता है।

ज्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति के अखाड़े बने हुए हैं। ऐसे में सबसे पहली जरूरत विश्वविद्यालयों की बुनियादी व्यवस्थाओं में सुधार लाने की है, लेकिन ऐसा करने के बजाय मंत्री जी भड़काने वाले बयान देने में लगे हैं। जो प्रदेश अपने अतुल्य देशप्रेम के लिए जाना जाता है, जहां हर दूसरे परिवार का एक सदस्य सेना में है, उस प्रदेश के मंत्री का इस तरह के ‘तोड़ने’ वाले बयान देना कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। जिस राजनीतिक दल, भाजपा में मंत्री जी हैं, हो सकता है उसके राजनीतिक एजेंडे में इस तरह के बयानों को बढावा देने की बात हो, लेकिन धन सिंह रावत को अहसास होना चाहिए कि अब वे संगठन के पदाधिकारी मात्र नहीं बल्कि संवैधानिक पद पर हैं।

उनके बयान केवल उनके नहीं बल्कि सरकार के बयान हैं, और सरकार को हमेशा जोड़ने वाले बयान देने चाहिए, ना कि तोड़ने वाले।

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