ऐसा लगता है मानो सत्ता नहीं सिर्फ ‘निजाम’ बदला है

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ठीक एक महीने पहले 18 मार्च को जब त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो बहुत से लोगों ने इसे प्रदेश की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत बताया। ऐसा इसलिए क्योंकि त्रिवेंद्र तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों खंडूरी, कोश्यारी और निशंक के रहते हुए मुख्यमंत्री बनाए गए थे।

यूं तो वे विधानसभा चुनाव से पहले कहीं से भी भाजपा का ‘चेहरा’ नहीं थे। यहां तक कि पिछला विधानसभा चुनाव और फिर उपचुनाव हार जाने के बाद वे प्रदेश के सियासी परिदृष्य से करीब-करीब बाहर चल रहे थे।

लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो, मानो त्रिवेंद्र की लाटरी खुल गई। संघ और शाह से करीबी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी और तमाम दावेदारों को पीछे छोड़ वे मुख्यमंत्री बन गए।

उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद राजनीतिक जानकारों से लेकर आम-जनमानस तक सभी को यह कहते सुना-देखा गया कि, त्रिवेंद्र के पास बड़ी सियासी लकीर खींचने का स्वर्णिम अवसर है।

चूंकि पहली बार किसी सरकार को इतना मजबूत जनादेश मिला, लिहाजा सरकार से ‘मजबूत’ फैसलों की उम्मीद जायज थी। मगर एक महीने के कार्यकाल में सरकार ने एक भी मजबूत फैसला लेना तो दूर उसके लिए जाने का संकेत तक नहीं दिया है। अलबत्ता, विवादास्पद फैसलों के चलते सरकार इस महीनेभर की अवधि में ही खूब चर्चाओं में आने लगी है।

हालांकि किसी सरकार की परफारमेंस का आकलन करने के लिए एक महीने का समय बहुत छोटा है, लेकिन इस अवधि में इतना तो पता लग ही सकता है कि सरकार के कदम किस दिशा को बढ रहे हैं।

त्रिवेंद्र सरकार के एक महीने के कार्यकाल को देखने पर फौरी तौर पर यही समझ आ रहा है कि उनकी सरकार पूर्ववर्ती सरकारों के बनाए रास्ते पर ही चल रही है।

उम्मीद भले ही यह की जा रही है कि त्रिवेंद्र अपनी राह खुद तैयार करेंगे, लेकिन अब तक का उनका कार्यकाल तो कहीं से भी ऐसा जाहिर नहीं करा पाया है।

भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस और लोकायुक्त का प्रवर समिति के हवाले हो जाना

मुख्यमंत्री बनने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपना पहला वक्तव्य कुछ यूं दिया था कि, वे भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ की नीति अपनाएंगे और सुशासन एवं पारदर्शी सरकार देंगे। उनका यह बयान अगले दो-तीन दिनों तक मिडिया की सुर्खी बना रहा।

इसके चंद दिन बाद विधानसभा सत्र बुलाया गया तो सरकार ने लोकायुक्त तथा ट्रांसफर एक्ट को सदन पटल पर पेश कर खूब वाहवाही बटोर ली।

इन दो अधिनियमों को सदन में रख कर त्रिवेंद्र सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की की प्रदेश में व्यवस्थाएं सुधारने के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

मगर जब तक प्रदेश की जनता इस कदम की तारीफ करती, सरकार ने खुद ही कदम पीछे खींच दिए। विपक्ष के समर्थन के बावजूद सरकार ने लोकायुक्त एक्ट को विधानसभा की प्रवर समिति के हवाले कर दिया।

लोकायुक्त एक्ट का सदन में पेश होना, जितनी उत्साहजनक खबर थी, उससे ज्यादा निराशाजनक था इसका प्रवर समिति की गति को प्राप्त हो जाना।

ट्रांसफर एक्ट का भी यही हाल हुआ। बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर एक्ट के लागू होने का इंतजार पिछले पांच साल के किया जा रहा है। पिछली सरकार की करारी हार के पीछे एक बड़ा कारण उसका ट्रांसफर एक्ट को लटकाए रखना भी रहा। इसके चलते ट्रांसफर-पोस्टिंग की प्रक्रिया ‘उद्योग’ में तब्दील हो गई। इस गोरखधंधे में मंत्री से लेकर बड़े अधिकारी और निचले कर्मचारी तक शामिल थे।

इस बार त्रिवेंद्र सरकार यह दावा करते हुए इस एक्ट को सदन में लेकर आई कि अब प्रदेश में साभी ट्रांसफर पारदर्शी तरीके से होंगे। मगर यह एक्ट भी फिलहाल प्रवर समिति के हवाले कर दिया गया है।

विवादित अफसरों पर मेहरबानी

किसी भी सरकार का पहला कदम अथवा पहला आदेश उसकी भविष्य की कार्यशैली को बहुत हद तक ‘क्लीयर’ कर देता है। इस लिहाज से देखें तो त्रिवेंद्र सरकार ने कार्यभार संभालने के बाद जो पहला बड़ा आदेश जारी किया, ‍उससे यही संकेत मिलता है कि इस सरकार में भी नौकरशाही या यूं कहें कि चंद बड़े साहबों की ही तूती बोलेगी।

त्रिवेंद्र सरकार ने पहले आदेश के जरिए सीनियर आईएएस अधिकारी ओम प्रकाश को मुख्यमंत्री का अपर मुख्य सचिव नियुक्त कर एक तरह से यह साफ कर दिया है कि पिछली सरकारों में जो भूमिका एम रामचंद्रन, उमाकांत पंवार, मीनाक्षी सुंदरम और प्रदेश के सबसे विवादित अफसर रहे राकेश शर्मा की हुआ करती थी, वर्तमान सरकार में उस भूमिका में ओम प्रकाश होंगे।

ओम प्रकाश को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र का फेवरेट अफसर आज से नहीं माना जाता। कहते हैं कि दस साल पहले खंडूरी सरकार में बतौर कृषि मंत्री रहते हुए त्रिवेंद्र की नजरों ने ओम प्रकाश की ‘परख’ की थी।

अब से पहले तक ओम प्रकाश की छवि सत्ता से इतर राय रखने वाले अधिकारियों यानी दूसरे गुट के अफसरों में होती थी, लेकिन अब उन्हें पावर सेंटर बताया जा रहा है।

उन्होंने अपने कुछ फैसलों से इस बात को साबित करने की शुरुआत भी कर दी है। भ्रष्टाचार के आरोपी एवं बेहद विवादित छवि के शख्स मृत्युंजय मिश्रा को उन्होंने बतौर अपर स्थानिक आयुक्त बना कर न केवल उन पर ‘हाथ’ रख दिया है बल्कि उन्हें सचिवालय में बैठाने का पक्का इंतजाम भी करवा दिया है।

मुत्युंजय मिश्रा की कारगुजारियों से वाकिफ होने के बाद भी ओम प्रकाश का उन्हें अपने साथ रखना और इस पर मुख्यमंत्री का समर्थन यह बताने के लिए पर्याप्त है कि विवादित अफसरों की आगे भी बल्ले-बल्ले होती रहेगी।

विवादित अफसरों को बड़े ओहदे पर बिठाने का दूसरा उदारहण ऊर्जा विभाग में दिखता है जहां, कुछ दिन पहले ही बीसीके मिश्रा नाम के शख्स को उत्तराखंड पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) का प्रबंध निदेशक बना कर बैठाया गया है।

मिश्रा की नियुक्ति त्रिवेंद्र सरकार का बेहद हैरानी भरा फैसला है, क्योंकि पिछली सरकार में भाजपा इन्हीं मिश्रा को महा-भ्रष्टाचारी बताते नहीं अघाती थी।

बीसीके मिश्रा को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी यूपीसीएल का एमडी बनाना चाहते थे, लेकिन तब भाजपा ने विरोध और मिश्रा पर लगे आरोपों की गंभीरता के चलते वे ऐसा नहीं कर सके थे।

तब लगा कि मिश्रा का अध्याय अब बीती बात हो जाएगी, लेकिन गजब देखिए कि भाजपा ने उन्हें यूपीसीएल का चेयरमेन बना कर ‘बड़ी पारी’ खेलने का प्लेटफार्म दे दिया है।

एक तरफ भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस का दावा और दूसरी तरफ मिश्रा जैसे विवादित एवं भ्रष्टाचार के आरोपी व्यक्ति को ईनाम देना त्रिवेंद्र रावत सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है।

नहीं बढ सके शराब और खनन से आगे

उत्तराखंड के लिए इससे अफसोसजनक शायद ही कुछ होगा कि प्राकृतिक संपदाओं से भरा यह राज्य आज तक राज्य के लिए शराब और खनन के कारोबार से आगे नहीं बढ पाया है।

पर्यटन, साहसिक खेल, योग, फलोत्पादन, फ्लोरीकल्चर, कृषि तथा कुटीर उद्योगों की अपार संभावनाओं के बावजूद आज तक इन क्षेत्रों में मजबूती से चार कदम तक नहीं चल पाए हैं।

इस दिशा में सोचने के बजाय नीति नियंताओं का एक-सूत्रीय एजेंडा शराब और खनन के जरिए राजस्व जुटाना है। इस बार त्रिवेंद्र सरकार के पास इन दोनों स्रोतों से इतर कुछ ठोस सोचने का अवसर भी था और कठोर निर्णय लेने के लिए जरूरी मजबूत जनादेश भी।

लेकिन बावजूद इससे उनकी सरकार शराब और खनन पर ही आश्रित रहना चाहती है। इसका इससे बड़ा प्रमाण शायद ही दूसरा होगा कि शराब की दुकानों को बचाने के सरकार ने स्टेट हाई-वे का स्टेटस घटा कर उन्हें जिला हाई-वे में तब्दील कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देशभर में राजमार्गों से पांच सौ मीटर से कम दूरी पर स्थित शराब की दुकानों को हटाया जाना था, लेकिन चूंकि सरकार को नई दुकानों के लिए जगह नहीं मिली सो उसने स्टेट हाई-वे का नाम ही बदल दिया।

यह तब हुआ जब प्रदेशभर में मातृशक्ति की अगुआई में शराब बंदी के समर्थन में जोरदार आंदोलन चल रहा है।

हालांकि यह दीगर बात है कि शराबबंदी के फैसले से पहले सरकार को तममा व्यावहारिक पहलुओं को अच्छी तरह देखना-समझना चाहिए। सरकार भी ऐसा कह रही है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तोड़ निकालने के बजाय त्रिवेंद्र सरकार उसे अमल में लाती तो लगता कि वह शराब के बढते प्रचलन को रोकने की हिमायती है।

इससे बेशक राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता, मगर शराब के बढते जा रहे प्रचलन को इससे बहुत हद तक हतोत्साहित किया जा सकता था।

बहरहाल एक महीने के कार्यकाल में कुछ सकारात्मक पहल भी हुई हैं, जो यदि परवान चढ पाई तो प्रदेश के लिए अच्छी बात होगी।

मसलन सरकार ने एनएच घोटाले की सीबीआई जांच की संस्तुति कर अच्छा संदेश दिया। हालांकि जांच का अंजाम क्या होगा, यह कहना मुश्किल है।

उत्तर प्रदेश के साथ परिसंपत्तियों के बंटवारे को लेकर भी इस एक महीने में सराकारात्मक बातें सामने आई हैं। चूंकि दोनों प्रदेशों और केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है लिहाजा उम्मीद की जा रही है कि यह मसला जल्द सुलझ जाएगा।

इसके अलावा त्रिवेंद्र सरकार ने मंत्रिमंडल की बैठक यानी कैबिनेट मीटिंग के लिए निश्चिति तिथि तय कर एक अच्छी पहल की है।

पिछली सरकार में सबसे ज्यादा अनिश्चितता कैबिनेट बैठक को लेकर ही रहती थी। तब मुख्यमंत्री के सिवा आखिर वक्त तक शायद की किसी अन्य मंत्री, अधिकारी को कैबिनेट की जानकारी रहती थी।

इस अराजक कार्यशैली का हरीश सरकार को क्या खामियाजा भुगतना पड़ा, यह सबके सामने आ चुका है।

बहरहाल त्रिवेंद्र सरकार से उम्मीद यही की जा रही है कि वह पिछली सरकार की गलतियों से सबक लेकर राज्य हित में अच्छे फैसले लेगी।

मगर एक महीने में लिए गए अधिकतर फैसले तो कम से कम राज्य हित में लिए गए नहीं कहे जा सकते। एक महीने के कार्यकाल को देख कर तो यही लग रहा है कि, मानो केवल ‘निजाम’ बदला है, सत्ता नहीं।

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