क्या सरकार इतनी संवेदनहीन होती है?

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सरकार कैसी होनी चाहिए ? ऐसी ही ना, जो जनता के दुख दर्द को समझ सके और उसे दूर कर सके l आमजन के दुख में जो दुखी हो खुशी में खुश हो, सरकार से बस इतनी ही तो उम्मीद की जाती हैl अफसोस है कि सरकार में आने के बाद हमारे जनप्रतिनिधि बस इतना भी नहीं समझ पाते, बीते रोज एक हृदय विदारक घटना में 45 लोग काल का ग्रास बन रहे थे और सरकार उसी इलाके में जश्न में वयस्त थी ।

जनता विपत्ति में हो, उस पर दुखों का पहाड़ टूटा हो तो कोई ‘सरकार’ कैसे किसी जश्न में शरीक हो सकती है ? जौनसार बावर क्षेत्र में हुई इस बस दुर्घटना के बाद पूरे प्रदेश में शोक की लहर है l हालांकि जहां यह दुर्घटना घटी वह जगह हिमाचल प्रदेश की सीमा में आती है, लेकिन घटना सीधे उत्तराखंड से जुडी थी ।

दुर्घटना में खत्म हुए अधिकांश लोग उत्तराखंड के थे और वाहन भी उत्तराखंड का ही था। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिस वक्त बस हादसा हुआ और लोग दर्द से तड़प रहे थे, तब घटना स्थल से कुछ ही किलोमीटर दूर प्रदेश की सरकार मौजूद थी। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और विकासनगर के विधायक मुन्ना सिंह चौहान समेत भाजपा के तमाम नेता तब बिस्सू मेले का आनंद ले रहे थे।

एक तरफ इतनी बड़ी घटना घटित हुई और दूसरी तरफ रंगारंग कार्यक्रम चल रहा था। इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं तो क्या कहा जाए? होना तो यह चाहिए था कि मुख्यमंत्री और बाकी नेता तुरंत घटना स्थल पर पहुंचते, लेकिन उन्होंने वहीं से मौखिक निर्देश देकर मानो इतिश्री कर दी।

जिस प्रशासन को उन्होंने निर्देश दिए ताज्जुब की बात है कि वह पांच घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंच सका। इतना ही नहीं प्रशासन जब घटना स्थल पर पहुंचा, तो उसके हाथ खाली थे। डंडो और बोरों के सहारे शवों को सड़क तक लाया गया। उत्तराखंड के बचाव दल से पहले हिमाचल प्रदेश का बचाव दल घटना स्थल पर पहुंच चुका था।

बहरहाल उत्तराखंड सरकार ने मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने का ऐलान करके और एक शोक संदेश जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी। विपक्ष ने जरूर संवेदनशीलता दिखाई। घटना स्थल पर पहुंचे नेताओं और कार्यकर्ताओं में ज्यादातर विपक्ष के ही थे। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या सरकार इतनी संवेदनहीन होती है, क्या इस तरह की दुर्घटनाओं पर संवेदनशीलता दिखाने का दायित्व केवल विपक्ष का होता है ?

सरकार की जिम्मेदारी क्या सिर्फ मुआवजा घोषित करने और शोक संदेश देने भर की है l गौरतलब है कि जौनसार बावर क्षेत्र में लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। दुर्घटनाओं का मुख्य कारण तकनीकी खराबी और ओवर लोडिंग के रूप में हर बार सामने आता है। इस बार भी मुख्य कारण यही बताया जा रहा है, 32 सीटर बस में पचास के करीब लोग बैठै थे।

दुर्घटना से पहले बस में तकनीकी खराबी की बात भी सामने आ रही है, साफ है दुर्घटना का कारण लापरवाही थी । सवाल यह है कि सरकार इन कारणों का स्थाई निदान क्यों नहीं ढूंढती? क्यों खराब गाड़ियों को सड़क पर मौत बनकर दौड़ाया जा रहा है? क्यों गाड़ियों में होने वाली ओवर लोडिंग को रोका नहीं जा रहा है? क्यों कानून का पालन न करने और न करवा पाने वालों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए जा रहे?

ये सब वो सवाल हैं, जिनका जवाब हर कोई जानना चाहता है। इस घटना से सरकार का संवेदनहीन चेहरा तो सामने आया ही, आपदा प्रबंधन की पोल भी खुली है। हैरानी की बात है कि बड़े-बड़े दावे करने वाले आपदा प्रबंधन विभाग के पास दुर्घटना होने की स्थिति में त्वरित राहत के लिए कोई ‘रोडमैप’ नहीं है।

यह सब तब है जब प्रदेश केदारनाथ आपदा जैसी घटना को भुगत चुका है। सवाल उठता है कि आखिर सिस्टम कभी सबक लेगा भी या फिर लोगो को यूं ही लोगों को उनके हाल पर छोड़ देगा ?

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