‘ताकतवर’ सरकार, ‘कमजोर’ मुख्यमंत्री !

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हाल ही में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दो पीसीएस अफसरों को अपनी टीम में शामिल करना चाहा, पर मुख्यमंत्री की पसंद पर ‘किसी’ की नापसंद हावी हो गयी । अभी दो दिन पहले उत्तराखण्ड पीसीएस फर्स्ट बैच के एम एस बिष्ट व एल एम रयाल, इन दो अफसरों को बतौर अपर सचिव मुख्यमंत्री तैनाती के आदेश जारी हुये । लेकिन 72 घंटे के भीतर ही यह आदेश निरस्त कर दिये गये ।

चर्चा है कि इसके पीछे एक आईएएस लाबी का दबाव था, मुख्यमंत्री को बताया गया कि सचिवालय के लिए ये जूनियर अधिकारी हैं । आश्चर्य यह है कि मुख्यमंत्री दबाव में आ जाते हैं, वह भी उनके ‘जिनके’ खुद के लिए नियम कायदे कोई मायने नहीं रखते l विडम्बना देखिये जूनियरटी और कायदों की दुहाई उस सचिवालय में दी जाती है, जहां मनमानी के लिए आये दिन नियमों की अनदेखी होती हैl जहां शासनादेश बदल दिये जाते हैं, जहां मंत्री के अनुमोदन के बाद नोटिंग बदल जाती है, जहां पंद्रह साल में चार -पांच प्रमोशन हो जाते हैंl

जहां चपरासी प्रमोशन पाकर अधिकारी हो जाते हैं, जहां नियमों की परिभाषा रोज बदली जाती हो l जहां बैठकर अफसर अपने खुद के हित साधते हों, राज्य के संसाधनों पर खुलेआम ‘डाका’ डालते हों l जहां नियमों में बार बार शिथलिकरण कर हित साधे जाते हों, किसी के खिलाफ कोई एक्शन ना होता हो l

जहां तक इन दो अफसरों की बात है तो मुख्यमंत्री की पसंद होने के बावजूद उनकी तैनाती में नियम विरुध कुछ नहीं था l दोनो राज्य बनने के बाद के पहले पीसीएस बैच के अधिकारी हैं और बेहद मजबूत व साफ सुथरी छवि के माने जाते हैं l कहा जा रहा है कि इन दोनों की पोस्टिंग का आईएसएस लाबी ने यह कहते हुए विरोध किया कि वे जूनियर हैं और अभी अपर सचिव वेतनमान में नहीं हैं।

हैरत की बात यह है कि इन अधिकारियों के प्रमोशन पोस्टिंग का विरोध सिर्फ सचिवालय के लिए है। दोहरेपन की हद देखिए कि जब एक आईएएस अधिकारी इस सचिवालय में एक गैर संवर्ग के व्यक्ति की तैनाती करता है, तब कोई आपत्ति नहीं होती। जब मुख्यमंत्री किसी आईएएस अफसर को अपनी टीम में शामिल कर उसे बेशुमार ताकत दे देते हैं, तब किसी को आपत्ति नहीं होती। लेकिन जब मुख्यमंत्री साफ छवि के कुछ पीसीएस अफसरों को अपनी टीम में रखना चाहते हैं तो आपत्ति हो जाती है।

सवाल यह है कि यदि विरोध की ‘जायज’ वजह जूनियरटी ही है, तो फिर केवल सचिवालय में पोस्ट करने का ही विरोध क्यों ? इसी बैच के आधा दर्जन से अधिक अधिकारी सचिवालय से बाहर विभिन्न विभागों, आयोगों में बिना प्रमोशन और बिना ग्रेड-पे बढाए महत्वपूर्ण पदों पर हैं। मसलन- लेबर कमिश्नर, अपर आयुक्त, अपर निदेशक, सूचना आयोग में सचिव तथा आधा दर्जन जिलों में एमएनए जैसे महत्वपूर्ण पदों पर इस बैच के अधिकारी कार्यरत हैं।

इन पदों पर तैनाती में किसी को आपत्ति क्यों नहीं ? हकीकत यह है कि सेवाकाल के दौरान प्रमोशन में एक बार शिथिलीकरण का लाभ प्रदेश में इन अधिकारियों कोई नहीं दिया गया । जबकि इस शिथिलीकरण के हिसाब से तकरीबन दो साल पहले ही ये अधिकारी पदोन्नत थे। इसके लिए तब डीपीसी भी हो चुकी थी, लेकिन आईएएस लाबी ने अंत में वेतन विसंगति का अडंगा खड़ा कर दिया।

आशय साफ है उत्तराखंड के सिस्टम खासकर सचिवालय में, चंद अफसरों की मनमानी है। सिस्टम पर वह एकाधिकार जमाये रखना चाहते हैं l ताकि कोई शिथिलीकरण यदि हो तो सिर्फ उनके और उनके चहेतों के लिए हो, नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने पर भी कोई उनका कुछ न बिगाड़ सके। इसे अराजकता न कहा जाए तो क्या कहा जाए? आखिर कौन वो ताकतवार हैं ,जो मुख्यमंत्री की पसंद नापसंद पर हावी हैं ? क्या है उनका मकसद, क्यों दबाव में हैं मुख्यमंत्री ? सवाल तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की इच्छाशक्ति को लेकर भी उठता है।

आखिर इतने प्रचंड बहुमत वाली सरकार का मुखिया होने के बाद भी यदि वे अपनी पसंद के केवल दो अफसरों को अपने साथ नहीं रख पा रहे हैं, तो उन्हें ‘ताकतवर’ सरकार का एक ‘कमजोर’ मुख्यमंत्री क्यों न कहा जाए?

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