उत्तराखंड में शिक्षा की नई इबारत लिखती गिरीश-ज्योति की मुहिम

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उत्तराखंड में शिक्षा की नई इबारत लिखती गिरीश-ज्योति की मुहीम

टिहरी जिले के सूदूर चक्रगाँव भिलंगना के प्राइमरी स्कूल की ,  दो शिक्षकों ने बदल डाली तस्वीर

देहरादून : उत्तराखंड इन दिनों शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था को लेकर जंग का मैदान बना हुआ है। आये दिन शिक्षक संघ के सियासी गुरूजी सरकार से अपनी निजी हित की मांगों को मनवाने के लिए आन्दोलन करते रहते हैं। शायद ही कभी शिक्षक संघ ने पहाड़ में खाली हो चुके स्कूलों को लेकर सरकार को घेरा हो।

लेकिन इन सब के बीच कोई ऐसा भी है जो शिक्षा की सियासत से दूर उत्तराखंड के भविष्य की नई इबारत लिखने में जुटा हुआ। इन्हें न ड्रेस कोड की फ़िक्र है न अपने सुगम में तबादले की हां बस फ़िक्र है तो उन बच्चों की जिनकी अच्छी शिक्षा के लिए सरकार ने उन्हें वहां तैनात किया है।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं टिहरी जिले के भिलंगना विकासखंड में सूदूर चक्र गाँव के प्राइमरी स्कूल में तैनात शिक्षक गिरीश डंगवाल की। जिन्होंने अपनी सहयोगी शिक्षक ज्योति शर्मा के साथ बदहाल हो चुके प्राइमरी स्कूल को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की कतार में ला खड़ा कर दिया है।

स्कूल में पढ़ने वाले नौनिहालों को साफ़ सुथरी शर्ट-पैंट पहने, गले में टाई और आई कार्ड टंगे देखकर लगता है कि ये बच्चे किसी नामी प्राइवेट स्कूल होंगे। लेकिन इनकी असलियत यह है कि ये मासूम पहाड़ के एक दूरस्थ इलाके के सरकारी स्कूल बच्चे हैं।

जो न सिर्फ पढ़ाई बल्कि खेलों में भी अव्वल हैं। और इन सब के पीछे है उन दो शिक्षकों गिरीश डंगवाल और ज्योति शर्मा की मेहनत जिन्होंने इस स्कूल के स्तर को सुधारने के लिए अपनी जी जान लगा दी।चक्र गाँव के कक्षा एक के बच्चे जहां किताब पढ़ लेते हैं तो चौथी क्लास का बच्चा राज्यों की राजधानी फटाफट बता देता है।

चक्रगांव करीब पचास परिवारों वाला गांव है। सड़क से सवा किलोमीटर दूर इस गांव में राजकीय प्राथमिक विद्यालय है। इस स्कूल में इस समय 25  छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं। पहाड़ों में सरकारी स्कूलों के हाल किसी से छुपे नहीं हैं जिस वजह से अभिभावक अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं, लेकिन गिरीश और ज्योति की मेहनत का नतीजा है कि जो लोग अपने बच्चों को गाँव से दूर निजी स्कूलों में पढ़ाने ले गए अब वो वापस अपने गाँव के प्राइमरी स्कूल में उनका दाखिला करवा रहे हैं।

इस स्कूल के कक्षा दो के बच्चे किताबें पढ़ने के साथ ही अंग्रेजी में अपना परिचय में देने में सक्षम है। बच्चों को अंग्रेजी में फलों के नाम कंठस्थ है। सामान्य ज्ञान भी अच्छा है। भारत के राज्यों और देशों की राजधानी, महाद्वीप, महासागरों के नाम भी बच्चों को भली भांति याद हैं।

अपने दम पर सुधारा  शिक्षा का स्तर

गिरीश चंद्र डंगवाल साल 2009 में शिक्षा विभाग में भर्ती हुए जिसके बाद उन्हें पहली तैनाती चक्रगाँव में मिली। उनकी सहयोगी ज्योति शर्मा साल 2013 में भर्ती हुई हैं। गिरीश मूल रूप से कीर्तिनगर के थापली गाँव के रहने वाले हैं जबकि ज्योति शर्मा मूल रूप से ऋषिकेश के हरिपुरकलां की रहने वाली है।

दैनिक उत्तराखंड से अपने अनुभव साझा करते हुए ज्योति ने बताया कि उन्हें जब चक्रगाँव में तैनाती मिली तो तब यहाँ के हालात काफी खराब थे।  लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से वापस ले जा रहे थे। ऐसे में स्कूल को बचाए रखने के लिए उन्होंने इस अभिनव प्रयोग की शुरुआत की। जिसका नतीजा यह है कि आज स्कूल के बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल के बच्चे की तरह पढ़ लिख पा रहे हैं।

ज्योति ने बताया कि वो बच्चों को सहायक शिक्षण सामग्री के जरिये पढ़ाती हैं जिसे  बच्चे किसी विषय को जल्दी समझ जाते हैं। साथ ही बच्चों को हर रोज दो सामान्य ज्ञान के प्रश्न याद करने के लिए दिए जाते हैं। इसके साथ ही पिछले दिए गए प्रश्नों का रिपीटेशन भी करवाया जाता है।

स्कूल के एक क्लास रूम को चार्ट रूम बनाया गया है, जिसकी दीवारें चार्टों से पटी हुई है। शिक्षक गिरीश बताते हैं कि जल्द ही वो स्कूल में डिजिटल कक्षाएं  शुरू करने वाले हैं जिसके लिए वो अपने खर्चे पर प्रोजेक्टर खरीद रहे हैं।

अपने खर्चे पर बदली स्कूल की तस्वीर

गिरीश और ज्योति ने स्कूल को संवारने के लिए सरकारी मदद का इंतजार नहीं किया। दोनों शिक्षकों ने सरकार से मिलने वाली बच्चों के गणवेश को आकर्षक बनाने के लिए उसके साथ टाई और आई कार्ड जैसी चीजें जोड़ कर बच्चों का मनोबल बढाया।

गिरीश बताते हैं कि स्कूल में ड्रेस आने के बाद वो देहरादून आये और यहाँ से बच्चों के लिए अपने खर्चे से टाई , मोज़े , जूते , बेल्ट और आई कार्ड ले गए। आज स्कूल में हर उस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है जो निजी स्कूलों में बच्चों को सिखाने के लिए की जा रही हैं .

खेलकूद में भी अव्वल है यहां के बच्चे

चक्रगाँव के इस स्कूल में पढाई के साथ साथ खेलकूद  की गतिविधियां भी करवाई जाती है। स्कूल के छोटे से मैदान में ही बच्चे फुटबाल, वॉलीबाल, कबड्डी, स्कीपिंग रो जैसे खेलों का हुनर सीखते हैं।

ग्राम पंचायत के सहयोग से मनरेगा के जरिये स्कूल के  मैदान के चारों ओर बाउंड्रीवाल बनाकर सुरक्षित करवाया गया। पिछले साल संकुल स्तर पर हुई कबड्डी प्रतियोगिता में विद्यालय के बच्चे प्रथम स्थान पर रहे।

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