एक मुस्लिम कवि ने लिखी थी बद्रीनाथ की आरती

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भारत अनेकता में एकता का देश है, राजनीति के लिए भले ही देश को हिन्दु – मुस्लिम में बांट दिया जाता हो लेकिन सालों से हिंदु – मुस्लिम के भाई – भाई होने के प्रमाण मिले हैं। ऐसा ही एक प्रमाण है बद्रीनाथ धाम।

बद्रीनाथ धाम यूं तो हिन्दुओं का तीर्थस्थल हैं, जहां दूर – दूर से लोग भगवान बद्रीविशाल के दर्शन को आते हैं। यह धाम उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। 30 मई को इस धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खुल गए हैं और हर रोज यहां हजारों तीर्थयात्री शीश झुकाते हैं, शाम को आरती गाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बद्रीनाथ में गाई जाने वाली आरती एक मुस्लिम कवि ने लिखी है।

जी हां, सही पढ़ा आपने हिन्दुओं के चारधामों से एक बद्रीनाथ की आरती एक मुस्लिम कवि ने 101 साल पहले लिखी थी। उनका नाम फकरुद्दीन था। वह मूलरुप से चमोली जिले के नंदप्रयाग निवासी थे और पोस्टमास्टर हुआ करते थे। 1865 में बद्रीनाथ की आरती लिखने के बाद उन्होंने अपना नाम बद्रीनाथ के नाम पर अपना नाम बरुद्दीन रख दिया था।

बरुद्दीन बाद में श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति में सदस्य भी रहे। इसके अलावा वह तत्कालीन मुस्लिम कम्युनिटी के राष्ट्रीय सदस्य भी थे। 104 वर्ष की उम्र में वर्ष 1951 में उनका निधन हुआ। इतना ही नहीं चमोली जिले में होने वाली रामलीला में भी कई मुस्लिम भाई अपना सहयोग देते हैं, पात्रों के साज – सज्जा से लेकर मेकअप तक की सारी जिम्मेदारी उठाते हैं।

बद्रीनाथ धाम कौमी में एकता की मिसाल है और ये आरती हमेशा याद दिलाती है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। काश कि बद्रीनाथ धाम जैसा सौहार्द पूरे देश में फैल जाए। बहरहाल यहां पढिए मुस्लिम कवि बरुद्दीन की लिखी बद्रीनाथ जी की आरती

पवन मंद सुगंध शीतल हेम मंदिर शोभितम |

निकट गंगा बहत निर्मल श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |

शेष सुमिरन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वरम |

शक्ति गौरी गणेश शारद नारद मुनि उच्चारणम |

जोग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |

इंद्र चंद्र कुबेर धुनि कर धूप दीप प्रकाशितम |

सिद्ध मुनिजन करत जै जै बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |

यक्ष किन्नर करत कौतुक ज्ञान गंधर्व प्रकाशितम |

श्री लक्ष्मी कमला चंवरडोल श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |

कैलाश में एक देव निंरजन शैल शिखर महेश्वरम |

राजयुधिष्ठिर करतस्तुति श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम |

श्री बद्री जी के पंच रत्न पढ्त पाप विनाशनम |

कोटि तीर्थ भवेत पुण्य प्राप्यते फलदायकम |

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