क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड के खेत ऐसे क्यों होते हैं…

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लेखक : उत्तराखण्ड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के महानिदेशक डा0 राजेन्द्र डोभाल

उत्तराखण्ड की पारम्परिक कृषि पद्धति-सार :

सामान्यत; मैं उत्तराखंड के बहुमूल्य उत्पादों के बारे मे लिखता हूँ जिसका मुख्य उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न बहुमूल्य उत्पादों की वैज्ञानिक जानकारी आप सब प्रबुद्धजनों के माध्यम से आम जनमानस तक पहुंचाना हैं। कोई भी जन सामान्य, विशेष व्यक्ति यदि उत्तराखण्ड के बहुमूल्य उत्पादों को जानना व खरीदना चाहे तो केवल पहाड़ी एवं पारम्परिक के नाम से ही नहीं अपितु उनके वैज्ञानिक गुणों से भी परिचित हो।

वैसे तो उत्तराखण्ड का अधिकतम भूभाग पर्वतीय है, जिसको साधारणतः तीन प्रमुख भागों मे विभाजित किया जा सकता है, जिसमे निम्न ऊँचाई, मध्य ऊँचाई तथा अधिक ऊँचाई में प्रमुख रूप से खेती की जाती है। यदि उत्तराखण्ड की पर्वतीय कृषि को पारम्परिक रूप से देखा जाय तो स्थानीय लोगो ने भौगोलिक दृष्टिकोण से स्थानीय जरूरतों के अनुसार सम्पूर्ण कृषि को छोटी-छोटी जोत होने के बावजूद भी, सभी पोष्टिक आहरों की पूर्ति के लिये (अनाज, दालें, फल व सब्जी) कई अनोखी पद्यतियो का विकास किया है, जिसमें सार भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद्यति है। पुरातन समय से स्थानीय लोगों द्वारा विकसित इस तरह की पद्यति, जिसको इतनी holistic approach से किया गया, कि इसमें मानव पोषण, पादप संरक्षण व भूमि की उर्वरा शक्ति का सम्पूर्ण ध्यान रखा गया, सचमुच में एक अद्भुत वैज्ञानिक सोच ही रही होगी।

निम्न ऊँचाई, मध्य ऊँचाई तथा अधिक ऊँचाई तक खेती योग्य भूमि जिसमें अनाजों, दलहनी फसलों को उगाया जाता है, को तल्ली सार, मल्ली सार, घर के पास फल व सब्जी उत्पादन के लिये सग्वाड़ा तथा दूरस्थ खेत जहां खाद एवं रोजमर्रा के काम सम्भव न हों, को कटला मे विभाजित कर दिया।

जहां तक इस सार पद्धति को मैं समझ पाया हूँ का मुख्य उदेदश्य परिवार के लिये भौगोलिक स्थिति अनुसार सभी पोषक तत्व की पूर्ति के साथ-साथ, पादप संरक्षण तथा भूमि की उर्वराशक्ति संरक्षित करते हुये, टिकाऊ उत्पादन करना रहा होगा। यदि पारम्परिक सार पद्धति को देखा जाय तो इसमें मल्ली (upper), तल्ली (lower) को इस प्रकार बांटा जाता है, कि पूरे वर्ष व आगामी वर्ष में एक ही सार में, एक ही तरह की फसलों का उत्पादन न लिया जाय। जैसे एक वर्ष मे खरीफ सीजन के दौरान मई से नवम्वर तक बाराहनाजा व दलहनी फसलें एवं नवम्वर से मार्च तक रवि की फसलें या भूमि को परती छोड़ा जाता है। साथ ही कई स्थानों मे खाली खेतों मे पशुओं को भी छोड़ा जाता है जिसका वैज्ञानिक वजह भूमि की उर्वराशक्ति का संरक्षण करना होगा। सार पद्धति में एक ही फसल को लगातार एक ही खेत मे ना उगाने का एक वजह यह भी हो सकता है कि विभन्न कीट-व्याधि जो host specific होते है, उनका बिना किसी कृषि रसायन का उपयोग किये रोकथाम हो जाय।

यदि सम्पूर्ण सार पद्धति का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाय तो भूमि की मुख्य पोषण क्षमता ऊपरी सतह में ही निहित होती है। यदि एक ही तरह की फसलों को बारम्बार एक ही खेत से उत्पादन लिया जाय तो एक ही सतह से पोषक तत्वों का उपभोग के साथ-साथ कीट-व्याधि के प्रकोप भी बढ़ जायेगा एवं उत्पादन में भी लगातार गिरावट आयेगी, जबकि सार पद्धति मे एक holistic approach को अपनाया जाता है जिससे सतत टिकाऊ उत्पादन लिया जा सके।

डा0 राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
उत्तराखण्ड।

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