मैं चमोली हूँ, 58 बरस में नसीब नहीं हो पाई बुनियादी सुविधाएं

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साभार : संजय चौहान की फेसबुक वॉल से

मैं उत्तराखंड का सीमांत जनपद चमोली हूँ। आज मेरा जन्मदिन है। आज मैं अपने मन की बातें आपसे साझा करना चाह रहा हूं।

चन्द्र्मोली से लेकर चमोली, ज्योत्रीमठ से लेकर कत्युरी राजवंश, नंदाराजजात से लेकर रम्माण का सलुड से राजपथ तक का सफ़र बहुत ही गौरवाविन्त कर देने वाला रहा है। आज मेरा भी जन्मदिन है। आज में 58 बरस का हो जाऊंगा। 24 फरवरी १९६० को पौड़ी जनपद से अलग होकर मेरा गठन हुआ था। जब में महज १० साल का था तो मैंने २० जुलाई १९७० को गौना ताल टूटने की विभीषिका झेली। जिसके दिए जख्म आज भी हरे हैं। उस त्रासदी के बाद मैंने अपना मुख्यालय चमोली कस्बे से गोपेश्वर शिप्ट कर दिया था। १४ साल की उम्र में मैंने दुनिया को जंगल बचाने हेतु पर्यावरण संरक्षण का जादुई मंत्र अंग्वाल ( चिपको आन्दोलन) दिया और देश दुनिया को गौरा देवी का परिचय दिया। लेकिन आज जब चिपको की प्रासंगिकता सबसे ज्यादा है तो गौरा देवी और चिपको की गाथा केवल लेखों, काॅलम, अखबारों तक ही सीमित होकर रह गयी। ३४ साल की उम्र में अलग राज्य आन्दोलन की अगुवाई की, जिसका सूत्रधार में ही हूँ। ३९ साल की उम्र में भूकम्प की विभीषिका झेली। जिसने मेरे भविष्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया।

२००० में अलग राज्य का गठन हुआ, मुझे उम्मीद थी की मेरे गैरसैंण को स्थाई राजधानी का अहोदा मिलेगा और आवाम के सपने पुरे होंगे। लेकिन जल्द ही मेरा भ्रम भी टूट गया। लोगों ने मेरे गैरसैंण को राजधानी आयोग की बोतल में कैद कर दिया। गैरसैंण के नाम पर सबसे ज्यादा मुझे छला गया, अपनी राजनीती चमकाने के लिए लोगों ने मेरे नाम की रोटियां सेंकी और जब मुकाम मिला तो मुझे ही भूल गए।

२००६ में जनपद में आई भारी बारिश ने मेरे कई गांवो को भूस्खलन की जद में ला दिया। जिस कारण से विगत 11 सालों में 130 से अधिक गांव मौत के मुहाने पर आ चुकें हैं। 11 सालों से इन गांवों के विस्थापन की फाइलें तंत्र के मेजों की रोनक बढ़ा रही है। २ अक्तूबर २००९ को मेरी ५०० साल पुरानी मुखोटा नृत्य- रम्माण को यूनेस्को ने विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया। इससे पहले २००५ में मेरी फूलों की घाटी और नंदा देवी पार्क को भी विश्व धरोहर घोषित किया जा चूका है। मार्च २०१२ में बंड पट्टी में शराब के खिलाप प्रसिद कंडाली आन्दोलन की सफलता ने मेरा नाम क्रांति शहर मेरठ तक उंचा किया। जून २०१३ में आई हिमालयी आपदा ने मुझे झकझोर कर रख दिया। आपदा ने मेरी गोविन्दघाट और पिंडर घाटी का भूगोल ही बदल कर रख दिया था। आपदा ने इन घाटियों का चैन और शुकून छीन लिया है। इन घाटियों में आपदा से बहे पुल आज तक नहीं बन पाये फलस्वरूप लोग जान हथेली पर रखकर लकडियों के सहारे नदियों को पार कर रहें हैं। लोगों की जिंदगी ट्राली के रस्सों और बल्लियों के संग झूले रही है। अभी भी यंहा के हालत सामान्य नहीं हो पाये हैं। मेरे तीन संगम केवल आस्था के प्रतीक भर हैं। लेकिन इनको संवारने की योजनाएँ कागजों तक ही सीमित है।२०१४ के भादो के महीने आयोजित हिमालयी महाकुम्भ नंदादेवी राजजात यात्रा में मेरे यहाँ लाखो श्रदालु यात्रा में पहुंचे। सभी लोगों के अथक प्रयासों से उक्त जात निर्विवाद सम्पन्न हुई। इस आयोजन से मेरा हर गांव नंदामय हो गया था।२०१५ और 2016 में गैरसैण में विधानसभा सत्र और बजट सत्र ने गैरसैण राजधानी को लेकर नई उम्मीद जगाई थी। स्थाई राजधानी को लेकर मेरी उमीदों को मानो पंख लग गए थे। लेकिन जब राजनीतिक दलों की सच्चाई मालूम चली तो बहुत दुख हुआ। ये राजधानी के नाम पर केवल राजनीतिक रोटियां सेक रहें है।

26 जनवरी २०१६ को गणतंत्र दिवस की परेड में मेरे रम्माण की प्रस्तुती ने मुझे झुमने को मजबूर कर दिया। मेरे मुख्यालय गोपेश्वर में स्थापित पशुपालन विभाग के निदेशालय के यहाँ से देहरादून स्थानांतरित हो जाने से यहां की रौनक ही चली गयी है। वहीं मंडल में स्थापित जड़ी बूटी शोध संस्थान को खुद संजीवनी की तलाश है। भूकंप की दृष्टि से जोन पांच / अति संवेदनशील श्रेणी में होने के बाबजूद भी मुझे जलविधुत परियोजनाओं के नाम पर खुर्द-बुर्द किया जा रहा है जो भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

मेरे यहां निर्माणाधीन दर्जनो जलविधुत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरण के जानकारों का मौनव्रत भी समझ से परे है। मेरे दशोली गढ के कोट कंडारा गांव की होनहार बिटिया दिव्या रावत मशरूम मिशन के जरिये पूरे देश में मेरा नाम भी रोशन कर रही है। मुझे ऐसी बेटियो पर नाज है। मुझ पर प्रकृति ने अपना पूरा खजाना लुटाया- बद्रीनाथ, फूलों की घाटी, औली, हेमकुंड, चिनाप फूलों की घाटी, सहित कई अनगिनत उपहार दियें हैं। लेकिन निति नियंताओं ने सदैव मेरी उपेक्षा की है। मेरे देवाल ब्लाक के हरमल, चोटिंग, तोरती, झलिया, रामपुर, बलाण, पिनाऊ गांव, घाट ब्लाक के कनोल, जोशीमठ ब्लाक के द्रोणागिरी सहित दर्जनों गांव में 58 साल बाद भी न तो बिजली पहुँच पाई न ही सडक और न ही दूरसंचार। मेरे इन गांव के लोग डिजिटल युग में अँधेरे में जीवन यापन कर रहें है।

अधिकांश गांव के लोग प्राकृतिक स्रोतों से ही पेयजल ढोह रहें है। सबसे दयनीय स्थिति शिक्षा की है शिक्षको के अभाव में नौनिहालों को आखर का ज्ञान मिल रहा है। और जहाँ शिक्षक है भी वहां की कहानी भी जुदा नहीं है। मेरी निजमुला घाटी, झेलम घाटी, खेता-रामपुर घाटी के कई गांवो में आज तक फोन की घंटिया नहीं घिनघिनाई है। डिजिटल और बुलेट ट्रेन के युग में मेरे गांव के लोग २० से लेकर 25 किमी पैदल अपनी रोजमर्रा की वस्तुओं को पीठ में लेकर अपने गांव तक पहुँचते हैं। मेरे ६०० से अधिक गांवो में से अधिकांश गांवो में सडक नहीं पहुची है। कई गांवो की सड़कों की फाइलें वन अधिनियम की मकडजाल में फंसी हुई है। तो कई सड़के तंत्र की लापरवाई से फाइलों में कैद है।और जो बन भी रही हैं वो भ्रष्टाचार के चुंगल में है। ऐसे में मेरे इन गांवो तक सडक कब तक पहुंचेगी किसी को न

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