तो जनता नहीं, ये हैं ‘सरकार’ के ‘माई बाप’

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फाइल फोटो

 

पूरी बरसात निकल गयी लेकिन सरकार राजधानी की सड़कों के गड्ढे नहीं भर पायी। जबकि इन गडढ्ढों की वजह से राजधानी के मुख्य मार्ग पर ठीक रक्षाबंधन के दिन दो बालिकाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस हृदयविदारक घटना के बाद मुख्यमंत्री ने समीक्षा भी की  और प्रदेश भर में गड्ढों को दुरुस्त करने के निर्देश दिये लेकिन तब संबंधित महकमों ने मिट्टी डालकर अपने दायित्व की इतिश्री कर ली। अब पिछले कुछ दिनों से राजधानी में सरकार और सरकारी मशीनरी जबरदस्त तरीके से हरकत में है। जिम्मेदार महकमे दिन-रात सड़कों को दुरुस्त करने में जुटे हैं, उन्हें चमाकाया जा रहा है। सफाई से जुड़े महकमे भी मुस्तैद नजर आने लगे हैं।

सरकारी तंत्र की मुस्तैदी को देखकर यूं लगा मानो सरकार नींद से जाग उठी है, सरकार को सड़क पर चलने वाले आम लोगों की तकलीफ का गहरे तक अहसास हुआ है और सरकार ने दो बालिकाओं की गड्ढों के कारण अकाल मौत से सबक लिया है। लेकिन यह सब उस वक्त भ्रम साबित हुआ जब पता चला कि सरकार की यह मुस्तैदी तो राजधानी की चंद चुनिंदा सड़कों पर ही है। इन सड़कों पर इन दिनों देर रात तक काम चल रहा है, सरकारी अफसर खुद मौके पर खड़े होकर काम कराने में जुटे हैं।

यह वो सड़कें हैं जो भाजपा मुख्यालय को जाती हैं, एक सड़क वो है जो बीजापुर वीआईपी राज्य अतिथि गृह को जाती है, इसके अलावा वह सड़क भी है जो मधुबन होटल को जाती है। सौभाग्य से इनमे एक सड़क ऐसी भी है जो एक मलिन बस्ती की ओर जाती है। आश्चर्य यह है कि सरकार की यह मुस्तैदी राजधानी के मुख्य मार्ग पर दो बालिकाओं की गड्ढों के कारण हुई मौत के चलते नहीं बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के दौरे को लेकर है। इस दौरे की तैयारियों में ही साफ नजर आ रहा है कि सरकार शाह के दौरे को लेकर दहशत में है।

अगले सप्ताह 19 व 20 सितंबर को शाह दो दिन के देहरादून प्रवास पर हैं। इस दौरान सरकार और संगठन के साथ बैठकों के अलावा उन्होंने अपने सियासी एजेंडे के तहत एक दलित परिवार के घर भोजन करने भी जाना है। दो दिन में राजधानी के जिस भी मार्ग से शाह के काफिले ने गुजरना है, हर उस सड़क को चमकाया जा रहा है। अब न समय की दिक्कत है, न संसाधनों का रोना है और ना ही बजट की कमी। किसी पार्टी के अध्यक्ष के स्वागत की ऐसी तैयारी देहरादून संभवत: पहली बार देख रहा है। ऐसी तैयारी तो अभी तक महामहिम या प्रधानमंत्री के दौरे से पहले ही होती रही हैं।

जो सरकार कुछ दिन पहले तक आर्थिक संसाधनों का रोना रोती रही हो, जो सरकार स्वागत-समारोहों में खर्च के बजाय मितव्ययता की दुहाई देती हो, वही सरकार एक पार्टी अध्यक्ष के स्वागत में इस तरह खुल कर खर्च करे तो समझा जा सकता है कि उसकी प्राथमिकता क्या है। यह  सरकार की मंशा और सोच पर भी सवाल है। दरअसल पूरी सरकार की स्थिति इस वक्त उस स्कूल  के स्टाफ की तरह  है, जहां किसी ‘बड़े साहब’ का दौरा होना हो और प्रधानाचार्य से लेकर परिचारक तक सब के सब सहमे हुए हों। सरकार की ‘धुकधुकी’ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है आधिकारिक तौर पर विदेश यात्रा पर गए प्रदेश के मुख्य सचिव को दौरा छोड़ कर वापस बुला लिया गया, मानो प्रदेश में कोई बड़ी आपदा आ गई हो।

पूरा प्रदेश इस वक्त अलर्ट पर है, सरकार ‘छमाही’ का रिपोर्ट कार्ड तैयार करने में जुटी है। ऐसा लग रहा है मानो शाह न आ रहे हों कोई ‘माई बाप’ आ रहे हों। सच यह है कि इतनी संजीदगी और इतनी तत्परता प्रदेश से जुड़े किसी एक भी मसले पर इन छह महीनों में नहीं दिखाई गई। जो सरकारी मशीनरी राजधानी में गड्ढों की मरम्मत के लिये बजट का रोना रो रही थी वही मशीनरी इस वक्त खुलकर खर्च कर रही है। जो 108 इमरजेंसी सेवा पिछले छह माह से बजट न होने के कारण दम तोड़ रही है, उसे भी छह करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। पिछले छह माह में न जाने कितनी गर्भवती महिलाओं ने 108 सेवा न मिलने के कारण विषम परिस्थतियों का सामना किया, कई महिलाओं, नौनिहालों और अन्य रोगियों का जान गंवानी पड़ी लेकिन सरकार बजट की व्यवस्था नहीं कर पायी। लेकिन आश्चर्य देखिये शाह के दौरे के दौरान वीआईपी मूवमेंट में 108 की मुस्तैदी के लिये सरकार ने इसके लिये भी बजट की व्यवस्था कर डाली।

सवाल यह है कि सरकार की यह मुस्तैदी, इतनी संजीदगी जनता के लिये क्यों नहीं ? क्या सरकार के लिये शाह प्रदेश की जनता से अधिक महत्वपूर्ण हैं ? प्रदेश की मौजूदा सरकार किससे है अमति शाह से या फिर प्रदेश की जनता से? किसके प्रति सरकार को उत्तरदायी होना चाहिये, शाह के प्रति या फिर प्रदेश की जनता के प्रति? सरकार शायद यह समझने में भूल कर रही है कि शाह सरकार में किसी को मुख्यमंत्री या मंत्री तो बना सकते हैं मगर सरकार नहीं बना सकते। सरकार तो अंतत: वही जनता बनाती है जिसकी आज सरकार अनदेखी कर रही है। सच तो यह है कि इस अनदेखी की इजाजत तो ‘सरकार’ को शाह भी शायद ही दें, लेकिन सवाल यह है कि ‘सरकार’ को यह समझाए कौन ?

 

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