‘छोटी सरकारों’ को खत्म करती ‘बड़ी सरकार’

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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत : फाइल फोटो

त्रिवेंद्र सरकार ने दो दिन पहले कैबिनेट बैठक में एक बड़ा फैसला लिया जिसके मुताबिक प्रदेश के लगभग तीन सौ गांवों को नगर निगम, नगर पालिका तथा नगर पंचायतों में मिला दिया जाएगा। सरकार के इस फैसले से बड़े घपले की ‘बू’ आती है। जन विरोध को नरजअंदाज करते हुए जितनी तेजी के साथ यह फैसला लिया गया है, उससे तो यही लगता है कि इसके पीछे ‘आफ द रिकार्ड’ कोई कहानी जरूर है।

पहली नजर में इस फैसले के तार सीधे-सीधे जमीन के खेल से जुड़े लगते हैं। दरअसल अभी तक जो भू-कानून प्रदेश में प्रभावी है, नगर निकाय उसके दायरे से बाहर हैं। ऐसे में इस फैसले के लागू होने के बाद गांवों की हजारों हैक्टेयर भूमि एक ही झटके में निकायों की सीमा में आ जाएगी, जिसके बाद जमीन का खेल करने वालों के लिए ‘रास्ते’ खुल जाएंगे।

प्रदेश को अभी तक भू-कानून का असल लाभ इसी लिए नहीं मिल पाया, क्योंकि निकायों की सीमा इस कानून के दायरे में नहीं आती। इस कानून के मुताबिक प्रदेश से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहां ढाई सौ वर्ग मीटर तक ही भूमि खरीद सकता है। इससे ज्यादा भूमि खरीदने के लिए खरीद का प्रयोजन बताना तथा प्रदेश सरकार की अनुमति लेना जरूरी है। यही वजह है कि देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी जैसे बड़े शहरों में सक्रिय जमीन के सौदागर इस कानून से परेशान हैं, क्योंकि वे इन शहरों से लगे गांवों की जमीन का ‘सौदा’ नहीं कर सकते।

ऐसे में अब इन शहरों से लगे गांवों को निकायों में मिलाने के सरकार के फैसले पर संदेह होना लाजमी है, क्योंकि सबसे ज्यादा सीमा विस्तार इन्हीं क्षेत्रों का प्रस्तावित है। सरकार की मंशा इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि एक तरफ वह गांव और खेती बचाने की बात करती है और दूसरी तरफ गांवों और खेती को खत्म करने का उपक्रम रच रही है। जब इतनी बड़ी संख्या में गांव शहरों में मिल जाएंगे तो क्या वे खेती के लायक रह पाएंगे?

गांवों को बचाने के लिए सरकार आए दिन दावे करने नहीं थकती। गांवों में विकास की गंगा बहाने के लंबे-चौड़े दावे भी सरकार करती है? लेकिन क्या उन्हें शहरों में मिला देना, विकास कहा जा सकता है? यह तो सीधे-सीधे गांवों को खत्म करने की साजिश लगती है। सरकार की मंशा यदि नेक होती हो गांवों का उनकी जरूरतों के मुताबिक विकास करती, ना कि निकाय में मिला कर उनका वजूद खत्म करती।

दूसरी तरफ निकायों की बात करें तो उनकी दशा भी बेहद दयनीय है। पानी का संकट, यातायात की समस्या और चारों तरफ पसरी गंदगी के चलते प्रदेश के लगभग सभी निकायों के वासी बुरी तरह परेशान हैं। प्रदेश के तीन बड़े शहर देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी की ही यदि बात की जाए तो तीनों ही देश के सबसे गंदे शहरों की सूची में शामिल हैं। शहरों की दशा सुधारने के लिए निकायों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। हालत इस कदर खराब हैं नए निकाय कर्मियों की भर्ती करने और मौजूदा कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए निकायों में पास पैसा नहीं है। ऐसे में उनका सीमा विस्तार करना एक तरह से उन्हें भी भारी दबाव में ला देना जैसा है।

ग्राम पंचायतों और निकायों को छोटी सरकार कहा जाता है। कहते हैं कि छोटी सरकारें जितनी मजबूत और समृद्ध होंगी प्रदेश और देश भी उतना ही समृद्ध होगा। मगर यहां तो बड़ी सरकार इन छोटी सरकारों के बीच घालमेल करने पर तुली है। एक तरफ ग्राम पंचायतों को निकायों में मिला कर उन्हें खत्म कर रही है तो दूसरी तरफ शहरों को ओवरलोडेड कर उन पर भारी दबाव डाल रही है। ऐसे में तो यही लगता है कि बड़ी सरकार को पर्दे के पीछे से कोई और चला रहा है।

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