ड्रेसकोड में उलझी सरकार के राज में छाता ओढ़ कर पढ़ने को मजबूर नौनिहाल

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कुछ दिन पहले अखबार में एक तस्वीर छपी। तस्वीर थी प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और वर्तमान में लोकसभा के सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के पैतृक गांव पिनानी के सरकारी हाईस्कूल की, जहां बच्चे कक्षा के भीतर छाता ओढ़ कर पढ़ाई कर रहे थे। व्यवस्था की पोल खोल कर रख देने वाली उस तस्वीर ने हमारे सिस्टम के नकारेपन को सबके सामने लाकर रख दिया। उस तस्वीर ने यह साबित कर दिया कि राजनीतिक दलों के दावों और वादों की असलियत कितनी खोखली होती है। तस्वीर ने यह भी साफ कर दिया कि राजनीतिक दलों के एजेंडे में शिक्षा व्यवस्था की कोई अहमियत नहीं है।

तस्वीर यह बताने के लिए काफी है कि सरकार की प्राथमिकता शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड लागू करवाना, सुरक्षा दीवार बनवाना और झंडा फहराना है, ना कि शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करना। प्रदेश में नई सरकार को बने छह माह बीतने को हैं, मगर अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार के पास क्या रोडमैप है। शिक्षा, जो कि अपने आप में बहुत बड़ा विषय है। बजट और मानव संसाधन के लिहाज से भी शिक्षा महकमा सबसे बड़ा महकमा है। जवाबदेही के लिहाज से भी देखें तो यह वो महकमा है जो सरकार के लिए सबसे चुनौतीभरा है।

लेकिन लगता है सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा विभाग की चुनौतियां कहीं हैं ही नहीं। चाहे सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री हों या विद्यालयी शिक्षा मंत्री, दोनों ही पहले दिन से ड्रेसकोड में उलझे हुए हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का दोनों को पूरा समर्थन है। प्रदेश के लिए इससे दुखद स्थित और क्या होगी कि आज शिक्षा महकमे में ही तमाम ज्वलंत विषयों के बजाय ड्रेसकोड बड़ा मुद्दा बना हुआ है। दिलचस्प यह है कि इस मुद्दे पर सरकार को भीतर से ही चुनौती भी मिल रही है।

महाविद्यालयों में छात्र ड्रेसकोड के विरोध में हैं तो विद्यालयों में शिक्षक इस फैसले को ‘तुगलगी फरमान’ करार दे चुके हैं। कुल मिलाकर दोनों ही जगह ड्रेस कोड का मुद्दा सरकार के लिए गले की फांस बन चुका है। आलम यह है कि ‍महाविद्यालयों में तो भाजपा के आनुसांगिक संगठन आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दरअसल एबीवीपी को लग रहा है कि ड्रेस कोड का मुद्दा उसे कैंपसों में हाशिए पर धकेल सकता है। एसे में अपनी राजनीतिक जमीन की रक्षा के लिए एबीवीपी के छात्र नेता किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इसका जीता जागता प्रमाण यह है कि देहरादून स्थित प्रदेश के सबसे बड़े महाविद्यालय डीएवी के नव निर्वाचित छात्र संघ अध्यक्ष ने ड्रेस कोड लागू करवाने पर उतारू उच्च शिक्षा राज्यमंत्री को कालेज परिसर के भीतर घुसने न देने की खुली चेतावनी तक दे डाली है।

इस बीच छात्रों के विरोध को देखते हुए मंत्री जी द्वारा जब ड्रेस कोड के मुद्दे पर वोटिंग का प्रस्ताव उछाला गया तो उसे भी छात्र संगठनों ने सिरे से नकार दिया। विद्यालयी शिक्षा की बात करें तो वहां भी मंत्री जी को नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। मगर इससे इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि इस हकीकत को जानने समझने के बाद भी सरकार ड्रेसकोड लागू करने पर इस कदर आमादा है मानो इसके बाद प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा।

प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली किसी से छुपी नहीं है। पूरे मानसून के दौरान न जाने प्रदेशभर में कितने नौनिहाल जान जोखिम में डाल कर पहले स्कूलों तक पहुंचे और फिर जर्जर भवनों में पढने को मजबूर हुए। इसी तरह उच्च शिक्षा की बात करें तो कहीं महाविद्यालयों में बिल्डिंग नहीं हैं, तो कहीं अध्यापक। कहीं बैठने के लिए बुनियादी संसाधन नहीं है तो कहीं पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं। जहां ये सब हैं वहां अन्य जरूरी आवश्यकताएं नहीं हैं। कुल मिलाकर पूरी शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। इसके बाद भी इन सब समस्याओं का निदान और जरूरतों की पूर्ति करने के बजाय सरकार का पूरा फोकर ड्रेसकोड लागू करवाने पर है।

क्या सरकार को नहीं लगता कि ड्रेसकोड लागू करवाने से पहले विद्यालयों, महाविद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है? क्या सरकार को नहीं लगता कि पहले प्रदेश के शिक्षकविहीन विद्यालयों में अध्यापकों की तैनाती सुनिश्चित होनी चाहिए? क्या सरकार को नहीं लगता कि पहले विद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाई के लायक माहौल बनाया जाना चाहिए? अफसोसजनक है कि इन सवालों को दरकिनार करते हुए सरकार का पूरा फोकस ड्रेस कोड लागू करवाने, वीरता दीवार बनवाने और झंडा फहराने पर है।

सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रदेश की जनता ने उसे इन सब के लिए सत्ता नहीं सौंपी, बल्कि अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए उस पर भरोसा जताया है। और यदि सरकार इस जिम्मेदारी को निभाने में असफल रहती है तो फिर इससे शर्मनाक स्थिति दूसरी कोई नहीं हो सकती।

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