‘सचिन के आशियाने’ पर हाईकोर्ट का ‘हथौड़ा’

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मसूरी स्थित डहलिया हाउस में सचिन

लिटिल मास्टर सचिन तेंदुलकर को नैनीताल हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। नैनीताल हाईकोर्ट ने उनके करीबी दोस्त संजय नारंग की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने मसूरी के लंढौरा कैंट स्थित ‘सचिन के आशियाने’ के नाम से मशहूर  डहलिया बैंक हाउस की इमारत को ध्वस्त न किए जाने की अपील की थी। हाईकोर्ट ने नारंग की अपील खारिज करते हुए समस्त अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश दिया है। साथ ही मसूरी कैंट बोर्ड को डहलिया हाउस के पूल और तालाब के मामले में दोबारा सुनवाई करने को कहा है।

डहलिया बैंक हाउस मुंबई के कारोबारी संजय नारंग का है। हालांकि बहुत से लोग यह भी मानने हैं कि इसके के असली मालिक सचिन हैं। दरअसल सचिन जब भी मसूरी आते हैं तो इसी हाउस में ठहरते हैं। यही वजह है कि इसे ‘सचिन का आशियाना’ के नाम से भी जाना जाता है। मंगलवार को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की।

ये था पूरा मामला-

तीन साल पहले मसूरी कैंट बोर्ड ने इस आशियाने को लेकर एक आदेश जारी किया था। बोर्ड ने अपनी जांच में करीब 28 हजार स्क्वायर फीट निर्माण को बताते हुए उसे ध्वस्त किए जाने का आदेश जारी किया था। संजय नारंग ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपनी याचिका में नारंग ने कहा कि ध्वस्तीकरण के आदेश के पहले उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया। लेकिन संजय नारंग की अपील को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने खारिज कर दिया, जिसके बाद उन्होंने विशेष अपील दायर की।

विशेष अपील की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ और न्यायाधीश वीके बिष्ट की खंडपीठ ने पूल व तालाब को छोड़कर अन्य निर्माण के संबंध में दिए गए ध्वस्तीकरण के आदेश को सही मानते हुए अपील खारिज कर दी।  पूल व तालाब के मामले की सुनवाई का जिम्मा एक बार फिर से मसूरी कैंट बोर्ड को दे दिया गया है। हाइकोर्ट का यह फैसला सचिन तेंदुलकर और उनके दोस्त संजय नारंग के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

ऐसे विवादों में आए थे सचिन-

इस मामले में सचिन तेंदुलकर साल भर पहले (जुलाई 2016) तब विवादों में आए जब उन पर यह आरोप लगा कि उन्होंने कैंट बोर्ड से राहत के लिए तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से सिफारिश लगवाई थी। हालांकि मामले को तूल मिलने के बाद सचिन ने इस आरोप से यह कहते हुए साफ इँकार कर दिया था कि उक्त प्रापर्टी से उनका कोई लेना-देना नहीं है और उन्होंने रक्षा मंत्री से केवल इसला हल निकालने की गुजारिश की थी।

इसलिए अवैध ठहराया गया निर्माण-

दरअसल सचिन का आशियाना नाम से मशहूर यह बंगला रक्षा संस्थान आईटीएम (प्रौद्योगिकी प्रबंध संस्थान)  के बेहद पास स्थित है। छावनी और रक्षा संपदा संबंधी नियमों के मुताबिक इस संस्थान से पचास मीटर की दूरी तक  किसी भी तरह का नया निर्माण नहीं किया जा सकता है। यहां तक कि मरम्मत एवं सुधारीकरण संबंधी कार्यों के लिए भी रक्षा संस्थान से एनओसी लेना अनिवार्य है।

आरोप है कि नारंग ने साल 2008 में कैंड बोर्ड के अधीन आने वाली इस संपत्ति को खरीदते वक्त केंद्र सरकार से अनुमति नहीं ली, जिस कारण इसका दाखिल-खारिज नहीं हो पाया। इसके बाद नारंग ने लंढौरा कैंट बोर्ड से वर्ष 2009 में भवन में मरम्मत और अन्य सुधार की मंजूरी मांगी लेकिन उन्हें मंजूरी नहीं मिली। आरोप है कि इसके बाद भी उन्होंने निर्माण कार्य कराया। साल 2014 में कैंट बोर्ड ने 2014 में संबंधित भूमि पर कराए गए नवनिर्माण को ध्वस्त कराने का आदेश दे दिया।

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