सरकार की इस रोक का कोई फायदा नहीं

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उत्तराखंड सचिवालय

त्रिवेन्द्र सरकार ने एक फैसले के जरिए राज्य सेवाओं में पूरे सेवाकाल के दौरान पदोन्नति में एक बार मिलने वाली पचास फीसदी छूट पर रोक लगा दी है। सरकार का यह फैसला तकरीबन सात साल तक इस व्यवस्था के अमल में रहने के बाद आया। सरकार का यह फैसला अपने आप में बेहद आश्चर्यजनक है। क्योंकि इस फैसले के ठीक एक सप्ताह पहले पांच आईएएस अधिकारियों को नियमों में शिथिलीकरण करते हुए पदोन्नति दे दी गई। सचिवालय से लेकर विधानसभा और विभागों में बड़े पैमाने पर नये पद सृजित हुए और उन पर प्रमोशन भी कर दिये गये ।

ऐसे में सरकार का यह फैसला ठीक उस तरह का है जैसे कोई चतुर सुजान पीछे के रास्ते सीढ़ी लगाकर छत पर चढ़ जाए और फिर सीढ़ी को भी ऊपर खींच ले, ताकि कोई दूसरा ऊपर न आ सके। इसमें कोई दो राय नहीं कि सन 2010 में लागू हुए इस फैसले ने प्रदेश में अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच पदोन्नति की भूख को बढ़ाया है। साल 2010 में सरकार ने इस फैसले के जरिए पूरे सेवाकाल के दौरान एक पदोन्नति के लिए नियमावली में बदलाव करते हुए आवश्यक समायावधि में पचास प्रतिशत छूट दिए जाने का निर्णय लिया। इसके मुताबिक यदि किसी कर्मचारी को पदोन्नति दस साल में मिलनी है तो वह पांच साल में ही मिल जा रही थी। इस शासनादेश का दुष्प्रभाव यह रहा कि पूरे राज्य का तंत्र प्रमोशन के रोग से ग्रस्त है ।

उत्तराखंड पूरे देश में संभवत: इकलौता राज्य होगा जहां पन्द्रह साल सेवा करने पर अधिकारियों ने चार-चार पांच-पांच पदोन्नति हासिल की। राज्य गठन के वक्त जो कर्मचारी समूह ‘ग’ श्रेणी में कार्यरत थे, वे इन वर्षों में बड़े ओहदे पर पहुंच चुके हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अधिकारियों ने प्रमोशन के नाम पर कहां तक छलांग लगाई होगी। कुल मिलाकर असल बात यह है कि प्रमोशन के इस रोग ने पूरी व्यवस्था को खोखला करके रख दिया है। हर कोई सिर्फ और सिर्फ कुर्सी की जंग लड़ रहा है। तमाम महकमे कुर्सी की जंग के चलते सियासत की भेंट तक चढ़ चुके हैं।

प्रमोशन के इस रोग ने इस कदर संस्थागत गिरावट ला दी है कि आज प्रदेश के तमाम बड़े अधिकारी और संस्थाओं का कोई मान सम्मान नहीं रह गया है। बहरहाल, अब जो रोक सरकार ने लगाई है, वह यदि इस बीमारी का इलाज करने की मंशा से लगाई है तो फिर हकीकत यह है कि यह रोग इस बीमारी का इलाज कतई नहीं है। यह रोग तो सीधे-सीधे अपनी सेवा की शुरूआत कर रहे कर्मचारियों को प्रभावित करेगी।

यह रोक उन आईएएस अफसरों को भी प्रभावित नहीं करती जो अपनी सुविधा के लिए किसी भी नियम को गढ़ सकते हैं या खत्म कर सकते हैं। हफ्ते भर पहले पांच आईएएस अफसरों को सचिव पद पर दी गई पदोन्नति इसका ज्वलंत प्रमाण है। नियमानुसार ये अधिकारी इसके लिए अर्ह ही नहीं थे। चूंकि व्यवस्था उनके हिसाब से चलती है, अत: उनके लिए नामुमकिन कुछ भी नहीं है। बहरहाल, यहां पर मकसद सरकार द्वारा लगाई गई रोक का विरोध करना नहीं है। लेकिन सच यह है कि जितना गलत 2010 में यह फैसला लिया जाना था, उतना ही गलत अब इसे खत्म करना है।

इस रोक का फैसला तो तभी सार्थक माना जाएगा, जब प्रमोशन की बीमारी भी खत्म होगी। इसलिए इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए कि एक पदोन्नति की आड़ में जिन अधिकारी और कर्मचारियों ने एक दशक में चार-चार पदोन्नति हासिल की, क्या वे इसके योग्य थे? आकलन इस बात का भी होना चाहिए कि जो कर्मचारी जिस पद पर आज है, क्या वह वास्तव में वहां पहुंचने की योग्यता रखता है? अगर ऐसा नहीं है तो क्या सरकार को इस बारे में नहीं सोचना चाहिए ? क्या सरकार को वे कड़े कदम नहीं उठाने चाहिए, जिनके बारे में मुख्यमंत्री अक्सर जिक्र करते रहते हैं?

कुल मिलाकर यदि ऐसा नहीं होता है तो यह निर्णय भी उसी तरह राजनीति से प्रेरित समझा जाएगा। क्योंकि उस वक्त भी यह निर्णय तमाम चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए लिया गया था। दिलचस्प यह है कि प्रदेश में तब भी भाजपा की सरकार थी और अब भी भाजपा की सरकार है।

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