सामाजिक समरसता का प्रतीक है ‘पांडुकेश्वर’ गांव

0
64

देहरादून। भारतीय संविधान में सभी जातियों को एक समान अधिकार प्रदत्त होने के बावजूद आज भी देश के कई हिस्सों में जाति या ऊंच-नीच के आधार पर लोगों के बीच तलवारें खिंचती देखी जा सकती हैं। विभिन्न सामाजिक संगठन यहां तक कि कानून भी जहां अब तक देश को इस बुराई से पूरी तरह नहीं निकाल सका है, वहीं उत्तराखण्ड का एक गांव एंसा भी है, जो जाति भेद पर विश्वास न कर जातिवाद के पहरेदारों को आईना दिखाता है। सामाजिक समरसता का प्रतीक ‘पांडुकेश्वर’ नामक इस छोटे से गांव में समाज के कुलीन वर्ग में विवाह को लेकर जाति का कोई बंधन नहीं है।

पांडुकेश्वर गांव मोक्ष धाम श्रीबदरीनाथ और जोशीमठ के बीच में स्थित है। मान्यता है कि हस्तिनापुर की गद्दी राजा परीक्षित को सौंपने के बाद पांडवों ने यहां तपस्या की थी, लिहाजा इस गांव का नाम पांडुकेश्वर रख दिया गया। गांव के बड़े बुजुर्गों की मानें तो पास में श्रीबद्रीनाथ धाम स्थित होने के कारण देश के तमाम हिस्सों से लोग यहां आते गये और बसते चले गये। पांडुकेश्वर में निवास करने वाले लोग राजस्थान व दक्षिण भारत से आये आव्रजक जातियों के वंशज बताए जाते हैं। यह गांव भले ही छोटा सा हो लेकिन पूरे देश को सामाजिक समरसता की राह दिखा रहा है। दरअसल, इस गांव में कुलीन समाज (ब्राह्मण व ठाकुर) में विवाह के सम्बंध में कोई जाति बंधन नहीं है। इन दोनों जातियों के लोग आपसी वैवाहिक रिश्ते को तहेदिल से स्वीकार करते हैं। अन्तर्जातीय विवाह की परम्परा गांव में कब, कैसे और क्यों शुरू हुई, इस बारे में कोई ठोस प्रमाण या मान्यता नहीं है, हालांकि बुजुर्गों का कहना है कि क्योंकि गांव में अधिकांश लोग बाहरी राज्यों से आकर बसे थे, ऐसे में वैवाहिक सम्बंधों के लिये आसपास के क्षेत्र में कोई उनका नजदीकी रिश्तेदार या बिरादरी का नहीं था। बुजुर्गों के मुताबिक उस समय कुलीन वर्ग के ग्रामीणों में अन्तर्जातीय विवाह की एक आम राय बन गई होगी, जो अब तक कायम है। शायद उस समय के ग्रामीणों ने इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि उनकी यह आम राय आने वाले समय में सामाजिक समरसता का प्रतीक बन जायेगी। इतना ही नहीं, पूर्वजों के अन्तर्जातीय विवाह का जबरदत बॉयोलाजिकल लाभ उनकी नई पीढ़ियों को मिल रहा है। बौद्धिक दृष्टि से नई पीढ़ियां बेहद प्रखर निकलीं। इसका नतीजा यह हुआ कि पांडुकेश्वर के कई लोग वर्षों से उच्च प्रशासनिक व विशेषज्ञ पदों पर आसीन हैं, जो अपने गांव के विकास में भी लगातार योगदान दे रहे हैं। बुद्धिजीवी वर्ग के प्रयासों से एडवांस को चुके इस गांव को अब ‘मिनी मुम्बई’ की संज्ञा दी जाने लगी है।

Loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here