उत्तराखंड के लजीज पकवानों से महका बेंगलुरु, युवाओं ने दिखाया हुनर

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उत्तराखंड के लजीज पकवानों से महका बेंगलुरु, युवाओं ने दिखाया हुनर
उत्तराखंड के लजीज पकवानों से महका बेंगलुरु, युवाओं ने दिखाया हुनर

देहरादून : उत्तराखंड अपनी संस्कृति और अस्थाओं के समागम से अपनी अलग पहचान बनाता है। उत्तराखंड में स्थानीय तौर पर अलग-अलग संस्कृति का स्वरूप दिखाई देता है। पहनावे की बात हो या फिर घरों की हो या उत्तराखंडी व्यंजनों की इसमें पहाड़ी संस्कृति की पहचान अहम है, जो उत्तराखंड की संस्कृति की पहचान को दर्शाता है।

उत्तराखंड के चार युवाओं के बनाए पकवान सभी की जुबान पर चढ़ गए

कुछ ऐसा ही हुआ बेंगलुरु  में जब उत्तराखंड के लजीज पकवानों की महक बेंगलुरु में महकी तो प्रवासी उत्तराखंडियों के साथ ही वहां के लोग भी गढ़वाली व्यंजनों के मुरीद हो गए।

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फाइव स्टार होटल की चेन में यहां पहली बार आयोजित फूड फेस्टिवल में जब गढ़वाली तड़का लगा तो लोग इन पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद चखने से खुद को रोक नहीं पाए। रविवार को समाप्त हुए दस दिवसीय गढ़वाली फूड फेस्टिवल में उत्तराखंड के चार युवाओं के बनाए पकवान सभी की जुबान पर चढ़ गए।

बंगलूरू के सेसिल्ड मैरियट होटल में काम करने वाले उत्तराखंड के चार युवाओं की…

बंगलूरू के सेसिल्ड मैरियट होटल में काम करने वाले उत्तराखंड के चार युवाओं की टीम ने प्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए एक पहल की है। मूल रूप से रानीखेत के रहने वाले होटल के हेड शेफ कृपाल सिंह (24) ने होटल मालिक अनिकेत शाह के सहयोग से दस दिवसीय गढ़वाल फूड पेस्टिवल का आयोजन किया। इसमें उन्होंने गढ़वाल में दादी और नानी के जमाने की 20 से ज्यादा व्यंजन तैयार किए। कृपाल सिंह ने बताया कि फेस्टिवल में गढ़वाली खाने ने खूब धूम मचाई। उन्होंने चिंतित होते हुए कहा कि आज उत्तराखंड के लोग ही गढ़वाल की संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। इसको बचाए रखने के लिए यह शुरुआत की गई है। उनकी इस सकारात्मक पहल में रानीखेत के ही पंकज सिंह, महेंद्र सिंह और टिहरी के राहुल ढौंढियाल ने भी सहयोग किया। फेस्टिवल में उनकी बनाई चार तरह की चटनी, चार तरह की रोटी, चार तरह के रायते और कई तरह की पहाड़ी दाल ने खूब आकर्षण बटोरा।

कई प्रवासी उत्तराखंडियों ने तो 22 साल बाद गढ़वाली खाना चखा

भुट्टे के स्वाद और मिठाइयों ने खाने की मिठास को दोगुना कर दिया। उन्होंने कहा कि कई प्रवासी उत्तराखंडियों ने तो 22 साल बाद गढ़वाली खाना चखा। खाना देखकर उन्हें गांव की याद आ गई। लोगों ने फेस्टिवल को खूब पसंद किया और अगले साल दोबारा आयोजन करने की अपील की। उन्होंने बताया कि बंगलूरू में उत्तराखंडी व्यंजनों में प्रयोग की जाने वाली सामग्री नहीं मिलती। लिहाजा विशेष तौर में एक शेफ ने उत्तराखंड आकर सारा सामान खरीदा। उनका कहना है कि जो स्वाद पुराने खाने में था वह अब नहीं है। इसलिए हम गढ़वाल के पारंपरिक व्यंजनों की पहचान को कायम रखना चाहते हैं।

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