कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर बादल फटा , 17 की मौत , 25 लापता

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कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर बादल फटा , 17 की मौत , 25 लापता

पिथौरागढ़ जिले के दुंगदुंग और मालपा में सोमवार सुबह फाटा बादल, कई मवेशी भी बहे , रेस्क्यू जारी

पिथौरागढ़ :  जिले की धारचूला तहसील में कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर मालपा में बादल फटने से मलबे में दबकर 17 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई जबकि 25 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक़ भारत- चीन और नेपाल सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले के दुंगदुंग और  मालपा में सोमवार सुबह बादल फट गया।  बादल फटने के बाद आये मलबे ने करीब 20 किलोमीटर के इलाके में जमकर तबाही मचाई है।  मलबे से घटियाबगड़ और मालपा में सेना के ट्रांजिट कैंप को भी भारी नुकसान हुआ है।

खबर लिखे जाने तक मलबे में दबकर करीब 17 लोगों की मौत हो गई है जबकि 25 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।  हादसे में सेना के एक जेसीओ के भी मरने की खबर है जबकि लापता लोगों में दो जेसीओ समेत सात जवान बताए जा रहे हैं। हादसे में छ घोड़े भी मारे गए हैं जबकि 17 घोड़े लापता बातये जा रहे हैं।

सड़क – पुल बहे , रेस्क्यू हो रहा मुश्किल

जिला प्रशासन से मिली  जानकारी के मुताबिक मालपा से लेकर घटियाबगड़ तक तीन होटल, चार दुकानें और सिमखोला में एक मोटर पुल बह गया है। घटियाबगड़ में सेना के ट्रांजिट कैंप  पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। दैनिक उत्तराखंड को मिली  जानकारी  के मुताबिक़ सेना के तीन ट्रकों समेत आधा दर्जन वाहन और सेना का सारा साजो सामान मलबे में दफन हो चुका है।

वावजूद इसके प्रशासन महज छह की मौत और 11 लोगों के लापता होने की बात कह रहा है। वहीं यात्रा मार्ग पर कई सड़कें और पुल मलबे की भेंट चढ़ चुके हैं । जिससे राहत बचाव में बचावकर्मियों को  काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है ।

रेस्क्यू में चुनौती बन रहा दुर्गम क्षेत्र

मालपा में बादल फटने के बाद हरकत में जिला प्रशासन को रेस्क्यू में खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है । जिसका कारण है घटना स्थल का पिथौरागढ़ मुख्यालय से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी। बताते चलें कि  मालपा जिला मुख्यालय से 145 जबकि  धारचूला तहसील से करीब 45 किलोमीटर दूर अत्यंत दुर्गम क्षेत्र है। इस इलाके में अभी तक संचार सेवा भी नहीं पहुचं पाई है जिस कारण अभी तक नुकसान की कोई ठोस जानकारी जिला प्राशसन के पास भी नहीं है।

इलाके में कहाँ कितना नुकसान हुआ है , कितने  पुल और  सड़कें बह गई हैं इन  सूचनाओं का आदान-प्रदान भी नहीं हो पा रहा है। घटियाबगड़ से मालपा  करीब नौ किलोमीटर पैदल दूरी पर है। सुबह करीब पांच बजे राहत कार्य के लिए धारचूला से रवाना की गई प्रशासन, राजस्व विभाग की टीम अभी तक रास्ते में ही फंसी हुई बताई जा रही हैं । सेना और आईटीबीपी के जवान स्थानीय लोगों के साथ मलबे में खोजबीन अभियान चला रहे हैं।

क्षेत्रीय लोगों से मिल रही सूचना से तबाही और भी विकराल हो सकती है क्योंकि इस क्षेत्र में धार्मिक यात्रा के अलावा स्थानीय लोगों की इन दिनों आवाजाही बढ़ी हुई थी। ऐसे में इन लोगों के मालपा और  घटियाबगड़ में रात्रि विश्राम की आशंका भी जताई जा रही है। जिसे लेकर लापता लोगों की संख्या में बढ़ोतरी की संभावना है।

मौसम बन रहा विलेन , सीएम नहीं पहुँच  पाए मालपा

मालपा हादसे का जायजा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और  वित्त मंत्री प्रकाश पंत हेलीकॉप्टर से दोपहर बाद पिथौरागढ़ पहुंचे। अधिकारियों से घटना की जानकारी लेने के बाद  सीएम घटनास्थल के लिए रवाना हुए लेकिन उच्च हिमालय क्षेत्र में मौसम खराब होने से पायलट ने जौलजीवी से ही हेलीकॉप्टर लौटा दिया।

कैलाश यात्रा को सुरक्षित जगहों पर रोका गया

मालपा में बादल फटने के बाद  विश्व प्रसिद्ध कैलाश मानसरोवर और आदिकैलाश  यात्रा में गए दलों को सुरक्षित स्थानों पर रोक दिया गया है। यात्रा  का संचालन कर रहे  कुमाऊं मंडल विकास निगम के जीएम त्रिलोक सिहं मर्तोलिया ने बताया कि कैलास मानसरोवर यात्रा के 16 वें दल को सिरखा पड़ाव में जबकि  वापस लौट रहे 12 वें दल को धारचूला में वहीं 13 वें 14 वें और  15 वें दल को गुंजी और चीन के इलाके में रोक दिया गया है। जबकि आदिकैलाश के दल को बूंदी में रोका गया है।

1998 में हुई तबाही की याद हुई ताजा  

मानसरोवर मार्ग पर मालपा में हुई तबाही से 1998 के भयावह मंजर की याद ताजा कर दी। मालपा  कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर तीसरे दिन की पैदल यात्रा में पड़ता है। 1998 से पहले यह मानसरोवर यात्रा का तीसरा पैदल पड़ाव होता था। 17 अगस्त 1998 की रात यहां बादल फटने से पहाड़ी ढह गई थी। जिसमें 60 कैलास मानसरोवर यात्रियों समेत 260 आइटीबीपी, पुलिस व यात्रा सेवकों की मौत हो गई थी।

महीनों शवों की खोज का अभियान चला था। तभी से यहां कैलास यात्रियों को रुकने नहीं दिया जाता। अलबत्ता बाद के दिनों में यहां फिर बरसात  होनी लगी। कई  होटल बह गए। भारत चीन व्यापार में जाने वाले और उच्च हिमालयी गावों के लोग धारचूला आने जाने के दौरान रात्रि विश्राम भी यहीं करते हैं।

 

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