‘नमो’निया की चपेट में उत्तराखंड सरकार

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‘नमो’निया की चपेट में उत्तराखंड सरकार

प्रचंड बहुमत वाली उत्तराखंड सरकार को लगता है ‘नमो’निया हो गया है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत समेत पूरी सरकार आकाओं के प्रस्तुतिगान वाली इस ‘बीमारी’ की चपेट में आ गई है। बीमारी इस कदर घर कर गई है कि जिस जनता ने चुनाव जिता कर सत्ता में बिठाया, उसकी जरूरतें भूल कर माननीय ‘जनसेवक’ नमो-नमो का जाप करने में जुटे हैं। इस जाप का एकमात्र उद्देश्य है- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘इंप्रेस’ करना।

इसके लिए कोई स्कूली बच्चों के साथ बैठ कर प्रधानमंत्री का चर्चित रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ सुन कर तस्वीरें ट्वीट कर रहा है, तो कोई राष्ट्रभक्ति की भावना का प्रसार करने के नाम महाविद्यालयों में वीरता दीवार बनवा रहा है। कोई प्रदेशभर के ढोल वादकों का मजमा जुटाकर उनसे ‘नमोनाद’ बजवा रहा है तो कोई अनुशासन के नाम पर ड्रेसकोड लागू करवाने में जुटा है।

जिन जनसेवकों को कुछ अलग नहीं सूझ पा रहा, उनमें से कुछ सीधे प्रधानमंत्री से मिल कर उन्हें गंगाजल से भरा कलश, बद्रीनाथ-केदारनाथ की तस्वीरें और अपनी लिखी किताब भेंट कर रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो प्रधानमंत्री के भाषणों, तस्वीरों और घोषणाओं को सोशल मीडिया पर शेयर कर खुद को रेस में बनाए हुए हैं। दिलचस्प यह है कि नजरों में बने रहने के फेर में पूरी सरकार के बीच एक अघोषित प्रतिस्पर्धा चल रही है। प्रतिस्पर्धा इस बात की कि, उन्हें सबसे ज्यादा इंप्रेस कौन कर पाता है।

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मगर क्यों? ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है कि पूरी  उत्तराखंड सरकार जनहित के काम करने के बजाय प्रधानमंत्री मोदी को खुश करने में लगी है? क्या जनता ने इसी लिए भाजपा को इतना भारी-भरकम बहुमत दिया था ?

निर्दलीयों की बैसाखी से चलने वाली पिछली कांग्रेस सरकार की परफारमेंस से निराश प्रदेश की जनता ने इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर प्रदेश की सत्ता सौंपी। इस उम्मीद से कि जो उपेक्षा उसे पिछली सरकार के कार्यकाल में झेलनी पड़ी, बहुमत वाली सरकार आने पर वह नहीं झेलनी पड़ेगी। जनता को उम्मीद थी कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार पर किसी भी तरह का दबाव नहीं होगा और वह तुष्टीकरण, नफे-नुकसान तथा सियासी गुणा-भाग से हट कर पूरी तरह प्रदेश हित के काम करेगी।

मगर जनता की इस उम्मीद पर मुख्यमंत्री और मंत्रियों का नमोजाप भारी पड़ता दिखने लगा है। इससे ज्यादा शर्मनाक क्या होगा कि जनता द्वारा चुने गए ये प्रतिनिधि उसकी समस्याओं का निदान करने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुश करने की जुगत में ज्यादा वक्त खर्च कर रहे हैं।

इसका सबसे नया प्रमाण बीते दिनो हरिद्वार में हुआ ‘नमोनाद’ कार्यक्रम है। प्रदेशभर के ढोल वादकों को हरिद्वार में बुलाकर दो दिन की कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसे नमोनाद का नाम दिया गया। इस आयोजन के कर्ताधर्ता कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने खुद अपने श्रीमुख से यह स्वीकार किया कि नमोनाद नाम रखने के पीछे एक बड़ी प्रेरणा प्रधानमंत्री के नाम (नमो) से भी मिली। इस तह से देखें तो प्रधानमंत्री को खुश करने की ललक में उन्होंने प्रदेश की उस ढोल संस्कृति को ही बौना कर दिया जिसका अतीत बेहद समृद्ध है।

सतपाल महाराज का यह मोदीराग तो केवल उदाहरणभर है। बीते पांच महीनों में एसे तमाम वाकये हो चुके हैं जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उत्तराखंड सरकार की प्राथमिकता जनता को खुश करना नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की नजरों में बने रहना है। वरना जनता के हितों का यदि सरकार को जरा भी ध्यान होता तो उसके अब तक के कार्यकाल में कुछ तो इस दिशा में जरूर हो चुका होता।

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प्रदेश में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की क्या स्थिति है, यह किसी से छुपा तथ्य नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो आज भी प्रदेश के दूर-दराज के गांवों की गर्भवती महिलाओं को सड़क पर प्रसव के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। सड़क न होने के चलते उन्हें चारपाई में बांध कर अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। इसी तरह शिक्षा व्यवस्था की हालत भी जस की तस बनी हुई है। प्रदेश के दुर्गम इलाके के सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की कमी बनी हुई है। ग्रामीणों के आंदोलन के बाद भी सरकार शिक्षकों का प्रबंध नहीं कर रही है। रोजगार की संभावनाओं पर लगा ब्रेक भी अभी तक हटा नहीं है।

नई सरकार से उम्मीद थी कि वह इन समस्याओं का स्थाई समाधान तो तलाशेगी ही साथ ही तब तक फौरी निदान के लिए भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाएगी। मगर सरकार के अब तक के कार्यकाल से तो ऐसा कोई संकेत नजर नहीं आया है।

दरअसल जिस तरह भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर लड़ा और जबर्दस्त समर्थन पाया, उसके बाद से भाजपा का हर नेता इस बात को भली भांति समझ चुका है कि 57 विधायकों की जीत में उनका व्यक्तिगत कम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का ज्यादा योगदान था। इसके बाद जिस तरह हाईकमान ने अपने मनमुताबिक मुख्यमंत्री का चयन किया उसके बाद तो साफ ही हो गया कि उत्तराखंड की सरकार पूरी तरह हाईकमान के रहमोकरम पर ही रहेगी।

संभवत: यही कारण है कि इतने मजबूत बहुमत के बाद भी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के मन में ‘कुर्सी’ बने रहने को लेकर डर बना हुआ है। इसी लिये हाईकमान की नजरें टेढी होने से पहले वे उसकी आंखों का तारा हो जाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री को खुश कर लिया तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।

मगर माननीयों को यह  नहीं भूलना चाहिए कि पांच साल बाद उन्हें जनता की अदालत में ही जाना है। रही बात प्रधानमंत्री मोदी के नाम की लहर की तो, सवाल यह है कि क्या काठ की हांडी बार-बार चढेगी?

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