उमाकांत पंवार के वीआरएस के पीछे कुछ तो ‘खेल’ है

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उमाकांत पंवार के वीआरएस के पीछे कुछ तो ‘खेल’ है

देहरादून। वरिष्ठ नौकरशाह उमाकांत पंवार के अचानक दिए गए इस्तीफे ने प्रदेश की नौकरशाही से लेकर सियासी गलियारों तक में तमाम ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं, जिनका जवाब जानने के लिए हर कोई आकलनबाजी करने में जुटा है। 1991 बैच के आईएएस अफसर उमाकांत पंवार के रिटायरमेंट में अभी पूरे नौ साल का वक्त बाकी था।

राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में सेवा देने वाले अफसरों की बात की जाए, तो अधिकतर अफसरों ने अपने सेवाकाल में अच्छा खासा प्रमोशन पाया। 17 साल में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और प्रमुख सचिव के पद से रिटायर होने वाले अधिकारियों की एक पूरी खेप इसका प्रमाण है।

ऐसे में माना यही जा रहा है कि यदि पंवार सेवाकाल पूरा करते तो उनका कद भी और ऊंचाइयां छूता, वे प्रदेश के मुख्य सचिव पद तक भी पहुंच सकते थे। लेकिन ऐसा चाहने के बजाय उमाकांत पंवार ने अचानक इस्तीफा दे दिया।

इससे भी हैरानी की बात यह है कि इस्तीफे के तुरंत बाद  राज्य सरकार ने उन्हें नव सृजित ‘उत्तराखंड स्टेट सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एंड गुड गवर्नेंस’ का निदेशक बना दिया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एक ऐसा अफसर जो राज्य में सेवा ही नहीं देना चाहता हो, को इतने महत्वपूर्ण ओहदे पर क्यों बिठाया जा रहा है? जाहिर है कि इसके पीछे कुछ तो ‘खेल’ जरूर है।

उमाकांत पंवार की ‘उत्तराखंड स्टेट सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एंड गुड गवर्नेंस’ के निदेशक के पद पर नियुक्ति को लेकर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि उनका वीआरएस मंजूर होने और उक्त पद पर नियुक्ति की सूचना एक ही दिन सार्वजनिक हुई। दस्तावेजों के मुताबिक 10 अगस्त को ही उनका वीआरएस स्वीकार हुआ और उसी दिन उन्होंने प्रदेश के मुख्य सचिव को अपनी नई नियुक्ति के बारे में सूचना दी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उमाकांत पंवार का वीआरएस स्वीकार होने में तमाम नियम कायदों को किनारे किया गया। अखिल भारतीय सेवाओं (डेथ कम रिटायरमेंट रूल्स) के नियम 16 (2) के मुताबिक सिविल सेवा का कोई अधिकारी यदि वीआरएस लेना चाहता है, तो उसे सेवा की अंतिम तिथि से तीन महीने पहले इसके लिए आवेदन करना जरूरी होता है। यानि किसी अधिकारी को आवेदन के तीन महीने बाद ही वीआरएस मंजूरी मिलती है।

आश्चर्यजनक है कि उमाकांत पंवार के मामले में तीन महीने की यह अवधि घटकर सप्ताह भर में सिमटा दी गई। उमाकांत पंवार ने इसी महीने तीन अगस्त को स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति का आवेदन किया और सात दिन बाद 10 अगस्त को ही उन्हें इसकी मंजूरी मिल गई।

संभवत: प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी के इतिहास में यह अपनी तरह का पहला मामला होगा, जब किसी ऐसे अफसर की नियुक्ति के लिए इतनी दरियादिली दिखाई गई, जो प्रदेश में सेवा ही नहीं करना चाहता हो। यही विरोधाभास तमाम तरह के सवालों को जन्म दे रहा है।

विवादों के हमेशा रहा है नाता

उमाकांत पंवार प्रदेश के विवादित अफसरों में गिने जाते हैं। पहली निर्वाचित तिवारी सरकार से लेकर मौजूदा त्रिवेंद्र सरकार तक में उमाकांत पंवार के पास तमाम महत्वपूर्ण विभाग रहे। शायद ही इस दौरान कोई विभाग रहा हो, जिसमें उनके ‘कारनामों’ की चर्चा न रही हो। पिछली कांग्रेस सरकार और वर्तमान सरकार में तो उमाकांत पंवार सत्ता के प्रिय अफसर रहे हैं।

हालिया वर्षों में उमाकांत पंवार सबसे ज्यादा चर्चित ऊर्जा महकमे को लेकर रहे। कहा जाता है कि ऊर्जा निगम में होने वाले भ्रष्टाचार को उनकी पूरी शह रही। भ्रष्टाचार के आरोपी ऊर्जा निगम के पूर्व एमडी सुमेर सिंह यादव को उमाकांत पंवार पूरा संरक्षण रहा। यादव को मिले तीन-तीन सेवा विस्तारों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उमाकांत पंवार की ही बताई जाती है।

यादव से पहले निगम में महत्वपूर्ण ओहदों पर रहे तमाम विवादित अफसर भी उमाकांत पंवार की छत्रछाया में खूब फले फूले। वर्तमान में निगम के एमडी पद पर तैनात बीसीके मिश्रा को भी उनका पूरा वरदहस्त बताया जाता है। कहा जाता है कि बीसीके मिश्रा की नियुक्ति उमाकांत पंवार की सिफारिश पर ही सरकार द्वारा की गई।

कुल मिलाकर उमाकांत पंवार की छवि एक विवादित नौकरशाह की रही है। ऐसे में एक विवादित छवि के सख्श को राज्य सरकार द्वारा इतने महत्वपूर्ण ओहदे पर नियुक्ति करना अपने आप में यह बताने के लिए पर्याप्त है कि इसके पीछे कुछ तो ‘खेल’ जरूर है।

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