गजब: रेल परियोजना के प्रभावितों को अंग्रेजों के जमाने के सर्किल रेट पर मुआवजा

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  • ऋषिकेशकर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना को महज 50 रूपये प्रति वर्ग मीटर की दर से की जा रही भूमि अधिग्रहित

  • अंग्रेजों के जमाने के सर्किल रेट पर किसानों की बहु उपजाऊ जमीन खरीद रही सरकार

देहरादूनयह सच है कि कुर्बानी दिए बगैर कुछ हासिल नहीं होता है, लेकिन ऐसी कुर्बानी का क्या फायदा जिससे आदमी पीढ़ियों तक कंगाल का ही कंगाल बना रहे। उत्तराखंड में जिस ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के बनने से राज्य की तस्वीर अौर तकदीर बदलने की बात की जा रही है, दरअसल वह किसानों के लिए अभिशाप बनकर साामने आ रही है। जी हां, हैरत की बात यह है कि सरकार अंग्रेजों के जमाने के सर्किल रेट के आधार पर किसानों की जमीन खरीद कर रही है।

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिग्रहित की जा रही चार जिलों की जमीन के दाम महज 50 रूपये प्रति वर्ग मीटर की दर से दिया जा रहा है। आज जब महंगाई चरम पर है, ऐसे समय में 60 साल पुराने रेट पर जमीन अधिग्रहण करना कहां का इंसाफ है। परियोजना से भले ही कायाकल्प होने की बात की जा रही है, लेकिन किसानों की पुश्तैनी जमीन को सरकार कौड़ियों के भाव खरीद कर सरकार उन्हें क्या दे रही है।

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ऐसे में काश्तकारों का गुस्सा जायज है, लेकिन इस पर सरकार को विचार करने की सख्त जरूरत है, ताकि काश्तकारों को उनका वाजिब हक मिल सके। सवाल यह भी है कि आज जिस सर्किल रेट पर सरकार उत्तराखंड के काश्तकारों को उनकी जमीन का मुआवजा दे रही है, क्या ग्रामीणों को इस रेट पर कहीं जमीन का एक इंच मिल पाएगा। आखिर सरकार इतनी संवेदनहीन क्यों हो गई। क्या सरकार को वर्तमान सर्किल रेट का पता नहीं है। प्रदेश में आज कृषि भूमि का सर्किल रेट कम से कम 2 से अधिक है, ऐसे में साठ साल पुराने सर्किल रेट पर मुआवजा तय करना रेल परियोजना में ऐतिहासिक मलेथा के सेरा की जमीन भी अधिग्रहित की जा रही है।

हालांकि इस पर राज्य सरकार ने पुनर्वास समिति को केंद्र सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखने की बात कही है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर सरकार इतनी संवेदनहीन कैसे हो गई। सरकार कैसे महज 50 रूपये के हिसाब से कैसे किसानों के लिए मुआवजे की राशि निर्धारित कर सकती है। यदि किसानों को इस निर्धारित रेट से मुआवजा दिया जाता है, तो उत्तराखंड के काश्तकार कंगाल के कंगाल रह जाएंगे।

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सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों ने शहरों में नदी-नालों पर कब्जा करने वाले लोगों को वर्तमान सर्किल रेट और वर्तमान महंगाई के हिसाब से दूसरी जगह बसाने काम कर रही है वहीं पुश्तैनी जमीनों पर खेती करने वाले पहाड़ के किसानों को महज पचास रूपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से जमीनों का मुआावजा दे रही है, जो कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं हो रहा है।

इससे पहले बजट सत्र में रेल लाइन के लिए अधिग्रहण की जा रही भूमि को इतने कम रेट पर खरीदे जाने का मुद्दा उठाया था। रुद्रप्रयाग से भाजपा विधायक भरत चौधरी ने विधानसभा में यह मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया, जिसका विधायक मुन्ना सिंह चौहान समेत कई अन्य विधायकों ने भी समर्थन दिया है। विधायकों ने बताया कि सरकार द्वारा 50 रूपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से जमीन खरीदी जा रही है।

जबकि परियोजना में मलेथा सेरा जैसी कई बहु उपजाऊ भूमि परियोजना की भेंट चढ़ रही है, लेकिन सरकार किसानों को अंग्रेजों के जमाने के सर्किल रेट के आधार पर मुआवजे का भुगतान कर रही है, जो उनके साथ नाइंसाफी है। शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने भी तब इस पर आपत्ति जताई है। उन्होंने इस मामले को पुनर्वास समिति को केंद्र सरकार के सामने गंभीरता से रखने की बात कही।

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वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने भी इस मामले को राज्य सरकार के अधीन न होने की बात कहते हुए केंद्र सरकार से इसके लिए सिफारिश करने की बात कही, ताकि किसानों को उनकी जमीन का जायज मूल्य मिल सके, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। टिहरी, पौड़ी, रूद्रप्रयाग और चमोली चार जिलों के हजारों एकड़ बहु उपजाऊ भूमि इस परियोजना की भेंट चढ़ रही है, लेकिन सरकार किसानों को वाजिब मुआवाजा देने को तैयार नहीं है, तो किसानों के सामने अब परियोजना के विरोध करने के सिवाय कुछ नहीं बचा है।

 

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