उत्तराखंड की मशरूम बिटिया उगा रही है बेशकीमती कीड़ाजड़ी!

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साभार संजय चौहान
मशरूम उत्पादन के जरिये पूरे देश में उत्तराखंड का नाम रोशन करने वाली चमोली के कोट कंडारा गांव निवासी मशरूम बिटिया दिव्या रावत कुछ दिनों बाद पूरे देश को हतप्रभ कर देने वाली है। क्योंकि दिव्या ने अपने अथक प्रयासों से देहरादून के मथोरावाला में अपने सौम्य फ़ूड प्राइवेट लि० की लैब में बेशकीमती कीड़ाजड़ी उगा दी है। मिलितारिस प्रजाति की ये कीडाजड़ी दिव्या के लैब में उग गई है। अभी तक ये कीड़ाजड़ी ३ सेमी उग चुकी हैं। और ५ सेमी तक बढेगी। अगले १५ से २० दिनों के बीच ये पूर्ण रूप से तैयार हो जायेगी। संभवतः ये देश की पहली लैब है जहां इस तरह से कीडाजडी का उत्पादन किया जा रहा है। थाइलैण्ड में भी इसी तरह लैब में कीडाजडी तैयार की जाती है।

बकौल दिव्या ये मेरा मशरूम के बाद एक और ड्रीम प्रोजेक्ट है। मैंने इसके लिए अपने दिन रात एक कर दियें हैं। हिमालय के बुग्यालों में पायी जाने वाले कीडाजडी का नाम कॉर्डिसेप्स साइनेसिस है जबकि ये कीड़ाजड़ी मिलितारिस प्रजाति की है। सामान्यतः इसे ट्रोपिंग मशरूम भी कह सकतें हैं। विश्व में व्यवसायिक स्तर पर ये लैब में ही तैयार की जाती है। मैंने लैब में इसे तैयार करने का प्रशिक्षण थाईलैंड से लिया है, जहाँ में कुछ महीने पहले गई थी। इसकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है।
यह पाउडर, कैप्सूल व चाय में उपयोग होता है। २ लाख रूपये प्रति किलो तक थोक मूल्य है इसका। मेरी लैब में यह लगभग ३०० किलो उगेगी। वैसे तो यह कहीं कहीं साल में तीन से चार बार उगाई जाती है। लेकिन मैं इसे दो बार उगाने का प्रयास करूंगी। बस १५ से २० दिनों के बीच ये तैयार हो जायेगी और मेरा ड्रीम प्रोजक्ट भी धरातल पर होगा। सारे देश की निगाहें इसी लैब पर लगी हुई है। मैं चाहती हूँ की लोग मशरूम की ट्रेनिंग के साथ साथ कीड़ाजड़ी की ट्रेनिंग के लिए भी उत्तराखंड आये तभी मेरा सपना साकार हो पाएगा।

 

इसका उपयोग होता है।भारत में यह जड़ी बूटी प्रतिबंधित श्रेणी में है। इसलिए इसे चोरी-छिपे इकट्ठा किया जाता है।
पूरे भारत में इसकी सिर्फ एक या दो प्रजाति पाई जाती है। लेकिन पूरे विश्व में 680 प्रजाति है। उनमें से militaris लैब में उगाई जा रही है और दुनिया में उसका commercial काम होता है। दिव्या संभवतः देश की पहली महिला है जो इसे लैब में उगा रही है।
हिमालयी बुग्यालों में उत्पन्न होने वाली कीडा जड़ी के दोहन पर प्रतिबंध है। क्योंकि इसके दोहन से हिमालय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हिमालय के नोमेंस लैंड में मानवीय हस्तक्षेप से बहुमूल्य वनस्पति और जैवविवधता को खतरा उत्पन्न हो है। व्यावसायिक रूप में इसके लैब उत्पादन में कोई प्रतिबंध नहीं है।
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