मंत्री जी ‘शक्तिमान’ नहीं तो ‘शक्तिमान’ सी बातें क्यों?

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त्रिवेंद्र सरकार के सौ दिनों में सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहने वाले मंत्री हैं अरविंद पांडे। पहले ही दिन से ही वे महकमे में अपने तल्ख तेवर और कड़क छवि दिखाने की कोशिश में हैं। जिसके चलते वे सुर्खियों में भी बने हुए हैं। मसला चाहे प्राईवेट स्कूलों पर शिकंजा कसने का हो या विभागीय अधिकारियों पर लगाम लगाने का । ऊंची पहुंच और पकड़ वाले अधिकारी-शिक्षकों के अटैचमेंट का मुद्दा हो या विभाग में ड्रेस कोड लागू कराना का। त

बादले हो या फिर नई नियुक्तियों का मसला, हर मुद्दे पर अरविंद पांडे ने लीक से हटकर खुद को ‘शक्तिमान’ दिखाने की ही कोशिश की। यह अलग बात है कि वे न तो निजी स्कूलों पर लगाम लगा पाए, न अपने विभाग को ही पटरी पर ला पाए, न ऊंची पकड़ और पहुंच वालों के अटैचमेंट खत्म कर पाए, न तबादला नीति ला पाए, न ड्रेस कोड पर आम सहमति बना पाए और ना ही स्कूलों के हालात सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठा पाए।

हां , हर मुद्दे पर वे बयान बहादुर जरूर बने रहे। शुरूआती दौर में जरूर अरविंद पांडे के तेवर उम्मीद जगाने वाले लगे, लेकिन धीरे-धीरे उनके दावों की हवा निकलनी शुरू हो गई। दावों की हकीकत तब सामने आयी जब बदलाव के नाम पर भाजपा नेताओं की पत्नियां और रिश्तेदार पहाड़ से उतार कर दून में तैनात कर दिए गए और पहुंच वालों के अटैचमेंट बरकरार रखे गए।

अब हाल ही में बयान बहादुर मंत्री जी ने एक अजीबोगरीब बयान दिया है कि जर्जर सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे अपनी सुरक्षा खुद करें। उन्हीं के शब्दों में कहें तो, ‘बच्चे अपना ख्याल खुद रखें, मैं कोई शक्तिमान नहीं’ , क्या राज्य के मंत्री को यह बयान शोभा देता है? वह भी उस मंत्री को जो दावा करते हैं कि साल भर में सरकारी स्कूलों की सूरत बदल देंगे। हकीकत यह है कि अरविंद पांडे में उत्साह और तेवर तो हैं , मगर वे व्यावहारिक धरातल से या तो वाकिफ नहीं हैं या उसे नजरअंदाज कर रहे हैं। राज्य भर में शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों की असलियत से वह वाकिफ भी हैं , इसमे शक है ।

महत्वपूर्ण यह है कि मंत्री जी का यह बयान ऐसे मौके पर आया है जब स्कूलों की खस्ता हालत पर नाराजगी जताते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। हाईकोर्ट के न्यायाधीश महोदय ने यहां तक कहा कि, यदि सरकार धन की कमी के कारण स्कूलों की दशा नहीं सुधार पा रही, तो उनके वेतन से स्कूलों की व्यवस्था सुधारी जा सकती है। जाहिर है राज्य सरकार के लिए यह बेहद शर्मनाक है।

आज वाकई में जिस बात की महति जरूरत है वह ये है कि सबसे पहले स्कूलों में सभी बुनियादी व्यवस्थाएं दुरूस्त की जाएं। आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों के भवन सुरक्षित हों, बैठने की व्यवस्था अच्छी हो, पेयजल का उचित प्रबंध हो तथा शौचालय की समुचित व्यवस्था हो। यह जिम्मेदारी सरकार की है और जाहिर सी बात है कि शिक्षा मंत्री होने के नाते सबसे ज्यादा अरविंद पांडे की है।

‘शक्तिमान’ न होने की दुहाई देने वाले मंत्री जी को मालूम होना चाहिए कि इसके लिए शक्तिमान होना आवश्यक नहीं। इसके लिए तो सिर्फ स्पष्ट सोच और राजनीतिक इच्छा शक्ति होनी चाहिए। जिस तरह से अरविंद पांडे ने अपनी पारी की शुरूआत की, उसे देखते हुए तो अब तक उन्हें अपनी प्राथमिकताएं तय कर देनी चाहिए थी, लेकिन वे अभी भी बयान बहादुर ही बने हुए हैं। बहरहाल अभी भी वक्त है, वरना जितनी सुर्खियां उन्होंने अब तक बटोरी हैं, उतनी ही फजीहत के लिए उन्हें तैयार रहना होगा।

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