सरकार की ‘सरकार’ को क्लीन चिट..

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बहुचर्चित ढैंचा बीज घोटाले में आखिरकार सरकार ने अपना ‘काम’ कर ही दिया। बिहार के चारा घोटाले की तर्ज पर घटित इस घोटाले में सरकार ने तत्कालीन मंत्री (वर्तमान मुख्यमंत्री ) और सचिव को ‘क्लीन चिट’ दे दी। तमाम दावों और मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए सरकार ने दोषी होने के बावजूद आयोग की जांच रिपोर्ट को नकार दिया । दरअसल वर्ष 2010 में कृषि विभाग में ढैंचा बीज घोटाला चर्चाओं में आया।
बीते सात साल से चर्चाओं में चल रहे इस घोटाले में निदेशक से लेकर तत्कालीन कृषि मंत्री तक की भूमिका संदिग्ध रही । घोटाले की जांच के लिए बनाए गए त्रिपाठी आयोग की रिपोर्ट लंबे समय से लंबित पड़ी हुई थी। इस रिपोर्ट ने स्पष्ट तौर पर तत्कालीन कृषि मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, तत्कालीन कृषि सचिव रणवीर सिंह व तत्कालीन कृषि निदेशक मदन लाल को दोषी ठहराया।
आश्चर्यजनक यह है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में ही आ चुकी यह रिपोर्ट शासन में धूल फांकती रही। रिपोर्ट को लेकर चर्चाएं तो बहुत हुई, लेकिन न तो सरकार ने इसे सार्वजनिक किया और ना ही इसके आधार पर कोई कार्रवाई हुई। जबकि नियमानुसार रिपोर्ट को कैबिनेट में रख कर उसमें दर्ज तथ्यों के आधार पर एक्शन लिया जाना चाहिए था।
बात-बात पर भाजपा को घेरने वाली कांग्रेस सरकार अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इस रिपोर्ट को दबाए रही । तीन बार मंत्रिमंडल की बैठकों में भी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इससे भी हैरत की बात यह है कि रिपोर्ट पर एक्शन लेने के बजाय सरकार ने चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते हुए उल्टा रिपोर्ट की जांच करने के लिए एक कमेटी गठित कर दी।
मंत्रिमंडल का यह फैसला अपने आप में बड़ा सवाल है। अब इस मामले में सरकार तब हरकत में आई जब इस संबंध में हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में उससे जवाब मांगा गया। सौभाग्यवश सरकार के मुखिया इसे वक्त वही त्रीवेन्द्र रावत हैं जो घोटाले में दोषी रहे हैं, इसके बाद जो कुछ हुआ वो सबके सामने है।
सरकार ने सत्र के दौरान आधी रात को बेहद गुपचुप तरीके से बिना किसी पूर्व सूचना के ढैंचा बीज घोटाले पर एटीआर यानी एक्शन टेकन रिपोर्ट सदन में पेश कर दी, जिसमें तत्कालीन कृषि मंत्री यानि मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तत्कालीन सचिव रणवीर सिंह को क्लीन चिट दे दी।
यह इसलिये किया गया ताकि कोर्ट में बताया जा सके कि घोटाले में सीएम का कोई मतलब नहीं । हालिया घटनक्रम में इस घोटाले का सारा दोष अब केवल तत्कालीन निदेशक मदन लाल के सिर पर डाल दिया गया है, जो कि लगभग चार साल पहले विभाग से रिटायर हो चुके हैं।
बहरहाल सरकार के इस एक्शन से दो चीजें बड़ी साफ तौर पर सामने आई हैं। पहला यह कि राजनीतिक दल एक दूसरे पर कितने भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाएं, लेकिन जब बारी एक्शन लेने की आती है तो वे उस पर पर्दा डालने का काम करते हैं। दूसरी बात यह कि प्रदेश में जांच के नाम पर बनने वाले आयोगों की वाकई में कोई अहमियत नहीं है।
ये आयोग सिर्फ मुद्दों को लटकाने और जनता की आंखों में धूल झोंकने भर को हैं। पहले तो रिपोर्ट ही नहीं आयेगी, और रिपोर्ट आयी भी तो उस पर एक्शन होगा नहीं।आज तक एक भी घपले घोटाले में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। आखिर में वही होता है जो सरकार चाहती है। प्रमाण सामने है, सरकार कभी ‘सरकार’ के खिलाफ नहीं जाती।
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