प्रतिभाएं पलायन की मोहताज नहीं होती…

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शाबास आयशा, शाबास आदित्य। जब सरकार से लेकर गैर सरकारी संस्थाएं और आम जनता तक एक सुर में पलायन का रोना रो रहे हैं, तब तुम नौनिहालों ने यह साबित कर दिखाया है कि प्रतिभाएं पलायन की मोहताज नहीं होती। जरूरत सिर्फ उन्हें तराशने की है, पहाड़ में भी उन्हें बखूबी तराशा जा सकता है ।

उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा में हाईस्कूल टॉप करने वाली छात्रा आयशा ने मैदान या तराई के किसी स्कूल में पढ़कर नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से पर्वतीय जिले रूद्रप्रयाग के एक स्कूल से पढ़कर यह मुकाम हासिल किया है। इस होनहार बिटिया के अंक सुनकर कौन गौरवान्वित न हो जाए ,500 में से 492 अंक।

चमोली जिले के पोखरी ब्लाक की रहने वाली यह बिटिया भविष्य की उम्मीद है। इसी तरह इंटर कक्षा का टॉपर छात्र आदित्य घिल्डियाल भी पहाड़ी जिले पौड़ी के श्रीकोट गंगनाली के एक स्कूल, सरस्वती विद्या मंदिर से निकला है। आदित्य ने 95 फीसदी अंक प्राप्त किए हैं।

दिलचस्प यह है कि हाईस्कूल तथा इंटर के टॉपरों की सूची से वे सरकारी स्कूल सिरे से गायब हैं, जिन पर सरकार हर साल करोड़ों रूपये खर्च कर रही है, जिस विभाग के अधिकारियों और शिक्षकों को कोरी तनख्वाह और भत्ते दिए जा रहे हैं।

पहाड़ की तो बात छोड़िए देहरादून के सुविधा संपन्न सरकारी स्कूलों से भी कोई टॉपर नहीं निकला। सरकारी सिस्टम के लिए इससे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है कि उन माँडल स्कूलों का नाम भी कहीं नहीं है जिन पर शिक्षा महकमा खास ध्यान दे रहा है। फक्र इस बात का है हाईस्कूल और इंटर की जो टॉन टेन की सूची है उसमें पहाड़ के स्कूलों का दबदबा रहा है, यह सूची सरकार और सिस्टम को आईना दिखाती है ।

इससे यह साफ है कि पहाड़ में प्रतिभाओं की कमी नहीं है । जो छात्र टॉप टेन में जगह बनाने में कामयाब रहे हैं, उनमें से तकरीबन सभी प्राईवेट स्कूलों के हैं। उनमें भी बड़ी संख्या सरस्वती विद्या मंदिर के छात्रों की है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सरकारी शिक्षकों के मुकाबले बेहद कम तनख्वाह और कम सुविधाएं पाने वाले प्राईवेट स्कूलों के अध्यापक अच्छे परिणाम दे सकते हैं तो फिर सरकारी शिक्षक क्यों नहीं ? क्यों नहीं सरकारी स्कूलों को बन्द कर प्राईवेट हाथों के हवाले कर दिया जाए।

यह तो साफ है कि खोट ‘नगीने’ में नहीं, बल्कि जौहरी में है। काश, सरकार और शिक्षा महकमा इन नतीजों से कोई सबक ले पाता। आज शिक्षा मंत्री स्कूलों में असल मुद्दे से इतर ड्रेस कोड लागू करने की बात तो कर रहे हैं। अगर ड्रेस कोड से शिक्षा का स्तर सुधरता है, तो ड्रेस कोड तत्काल लागू होना चाहिए, बशर्ते मंत्री जी और उनका महकमा इसकी गारंटी ले। विभाग के मंत्री और अधिकारियों को क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि इतने बड़े तामझाम के बावजूद सरकारी स्कूलों में स्थिति अच्छी क्यों नहीं है?

क्या जिम्मेदार लोगों को उन कारणों की पड़ताल नहीं करनी चाहिए कि क्यों सरकारी शिक्षक बेहतर परिणाम नहीं दे पा रहे है? क्या सरकार को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि शिक्षक शैक्षणिक गतिविधियों के अलावा किसी और गतिविधि में न फंसे रहें। इस दिशा में ध्यान देने के बजाय जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग पलायन जैसी समस्या को दोष देते हैं, लेकिन पहाड़ के होनहार बच्चों ने साबित कर दिया है कि पलायन का रोना बचकाना है।

बहरहाल सरकार की मंशा यदि सचमुच सरकारी शिक्षा के स्तर को सुधारने की है तो उसे अपने नजरिए में बड़ा बदलाव लाना होगा।

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