‘कॉकटेल’ पार्टी पर भारी पड़ी महिलाओं की ‘मांगल’

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उत्तराखंड में लोकगीतों का बड़ा महत्व है। त्योहार हो या शादी – ब्याह। ऋतु बदलें या फसल लहलहाए। देवी – देवता की पूजा हो या कोई भी पर्व। हर अच्छे काम की शुरूवात यहां लोकगीतों से ही होती है।

कुछ वर्षों पूर्व शादियों में भी हल्दी हाथ से लेकर विदाई तक की हर रस्म में लोकगीत गाए जाते है। लेकिन बदलती जीवनशैली के चलते ये परम्पराएं कहीं खोने से लगी हैं। पलायन कहें या आधुनिकता, वजह चाहे जो भी हो लेकिन अब कुछेक गांव की शादियों में ही इस तरह के लोकगीत सुनाए देते हैं।

ऐसे वक्त में जब गांव की जगह शहरों में ‘दी द्या मेरी मांजी जी, हल्दी का बाना हो’ मंगल गीत देहरादून की शादियों में सुनने को मिले तो आप भी थोड़े से हैरान हो जाएंगे।

लेकिन अपनी परम्पराओं को इस तरह से खत्म होते देख समाज सेविका शशी रतूड़ी ने इन लोकगीतों को सहेजने का प्रयास किया है। उन्होंने इसके लिए देहरादून में एक अनोखी पहल शुरू की है। इसके लिए शशी रतूड़ी ने अपने ही एनजीओ की महिलाओं की एक टोली बनाई है। यह टोली शादियों में मांगल यानि मंगल गीत गा कर उत्तराखंड के लोकगीतों को फिर से पुनर्जीवत करने का प्रयास कर रही है।

पहले किया कॉकटेल पार्टी का विरोध

हाल ही में शादियों में कॉकटेल पार्टी के विरोध में शशी रतूड़ी का खासा योगदान रहा है। शशी रतूड़ी की मुहिम से टिहरी के 58 गांवों में बिना शराब के शादी संपन्न हुई थी। इसके अलावा देहरादून में भी चार परिवारों ने बिना कॉकटेल पार्टी के शादी करवाई । दैनिक उत्तराखंड़ से हुई बातचीत में शशी ने बताया कि जिन लोगों ने बिना कॉकटेल के शादी संपन्न कराई। उन्होंने बाद में खुद स्वीकारा कि कॉकटेल पार्टी न कराने से उनके पूरे एक लाख रुपए की बचत हुई है।

कौन है शशी रतूड़ी

शशी रतूड़ी मूलत: टिहरी जिले की निवासी है, लेकिन उनकी परवरिश देहरादून में ही हुई है। शशी कम उम्र से ही चिपको आन्दोलन से जुड़ गई थी। इसके बाद शशी ने देखा कि गांव में महिलाएं धुएं में खाना बनाती है, जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। शशी ने चंडीगढ़ जाकर धुएं रहित चुल्हे बनाने सीखे और वापस आकर टिहरी के कई गांवों में इस धुएं रहित चुल्हों का निर्माण कराया। इसके बाद 1982 में शशी ने महिला नवजागरण समिति बनाई । इसके तहत शशी ने शराब के खिलाफ आवाज उठाई। तब से लेकर आज तक शशी उत्तराखंड में शराब के खिलाफ लड़ रही है। साथ ही उत्तराखंड की संस्कृति को संरक्षित रखने की जद्दोजहत में जुटी हुई है।

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