सलाहकारों से चलती है सरकार !

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सरकारों में सलाहकारों का अभी तक का जो तजुर्बा है, उत्तराखण्ड के लिए वह अच्छा नहीं रहा है। इसके बावजूद आज भी सलाहकार सरकारों पर भारी हैं। नई सरकार की बात करें, तो दो महीने बीतने के बाद भी मंत्रिमंडल में दो पद खाली हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इन पदों को भरने को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं ले पाए हैं , ना ही उनकी इसमें कोई दिलचस्पी नजर आती है ।

 

लेकिन दूसरी तरफ देखिए कि इस दो महीने की अवधि में ही मुख्यमंत्री के लिए चौथे सलाहकार की नियुक्ति की जा चुकी है। सवाल उठना लाजमी है कि सरकार के लिए मंत्री जरूरी हैं या फिर सलाहकार? यह भी बड़ा प्रश्न है कि सरकार सलाहकारों से चलती है या मंत्रियों से? पिछली सरकार का सलाहकारों के भरोसे रह कर जो हश्र हुआ, लगता है नई सरकार उससे कोई सबक नहीं लिया। सरकार के सलाहकार ‘प्रेम’ के चलते आज सलाहकार बनने की इच्छा रखने वालों कि कतार लम्बी होती जा रही है l बेहतर तो यह होता कि मुख्यमंत्री पहले अपना मंत्रिमंडल पूरा करते।

 

प्रचंड बहुमत वाली सरकार के पास मंत्री बनाने के लिए कई काबिल तथा अनुभवी विधायक मौजूद हैं। सरकार के सभी मंत्री अभी भले ही पूरी तरह एक्शन में न आए हों लेकिन कुछ विभागों में जरूर हलचल नजर आने लगी है। मसलन- पेयजल, शिक्षा, उच्च शिक्षा, शहरी विकास, कृषि, पर्यटन आदि। जाहिर है इस हलचल का श्रेय संबंधित महकमों के मंत्रियों को जाता है। मंत्रिमंडल में खाली पड़े दो पदों पर योग्य विधायकों की नियुक्ति की जाती तो सरकार का काम निश्चित तौर पर ज्यादा दिखाई देता। बहरहाल दो दिन पहले मीडिया सलाहकार के रूप में एक नए सलाहकार की नियुक्ति हुई है।

 

यूं तो यह अपने आप में समझ से परे है कि भारी-भरकम सूचना एवं लोकसंपर्क विभाग होने के बावजूद सरकार को मीडिया सलाहकार की जरूरत आखिर है क्यों? इससे भी अहम ये है कि मीडिया सलाहकार का काम क्या होगा? क्या यह तय करना कि अखबारों, न्यूज चैनलों में क्या-क्या छपेगा और क्या-क्या छुपेगा? क्या यह तय करना कि सरकारी खजाना किस-किस पर कितना-कितना लुटाया जाना है? किसे उपकृत करना है किसे नहीं l

 

बहरहाल सरकारों में सलाहकारों का चलन बेहद पुराना है। और उतना ही पुराना सलाहकारों से जुड़ा कड़वा अनुभव भी। खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का अनुभव इस मामले में अच्छा नहीं रहा है। पिछली भाजपा सरकार में बतौर कृषि मंत्री उन्होंने जिन साहब को अपना सलाहकार नियुक्त किया उनकी वजह से उन्हें बड़ी फजीहत झेलनी पड़ी थी। इसके बाद भी उन्होंने सलाहकार बनाने की परिपाटी जारी रखी है तो यह भी एक आश्चर्य है । सरकारों द्वारा रखे जाने वाले सलाहकार यदि विशेषज्ञ हों तब भी एक बारगी बात समझ में आती है। लेकिन मात्र खास लोगों को उपकृत करने के लिए सलाहकार बनाना आम जनता की गाढी़ कमाई का तो दुरुपयोग है ही साथ ही सत्ता का भी बेजा इस्तेमाल है।

 

इतना तो साफ है कि सलाहकारों का पद न तो कोई संवैधानिक पद है और ना ही आधिकारिक। यह सिर्फ सरकार की कृपा पर आश्रित पद है, जिनसे सरकार नहीं चला करती। इसे विडंबना ही कहेंगे कि अक्सर सरकार इन्हीं ‘कृपापात्रों’ के कारण फजीहत की शिकार होती है। उम्मीद की जाती है कि त्रिवेंद्र सरकार पुराने अनुभवों से सबक लेगी और सलाहकारों को फजीहत का कारण नहीं बनने देगी।

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