उत्तराखंड की इस तिकोनी झील के सौंदर्य पर फिदा हैं विदेशी सैलानी

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उत्तराखण्ड में स्थित प्राकृतिक झीलों का जिक्र हो और सतोपंथ झील का नाम न आये, ऐसा हो नहीं सकता। यह झील न सिर्फ धार्मिक लिहाज से बल्कि अपने अद्वितीय प्राकृतिक सौन्दर्य की वजह से विश्व के पर्यटन मानचित्र में दर्ज है। अक्सर प्राकृतिक झील का आकार गोल या चौकोर होता है लेकिन यह अद्भुत झील त्रिभुजाकार यानी तिकोनी है। भारतीय पर्यटक भले ही इस झील को प्राथमिकता न देते हों लेकिन विदेशी यहां मिलने वाली शांति और इसकी सुन्दरता पर लट्टू हैं। विदेशी सैलानी सतोपंथ झील पर इस कदर फिदा हैं कि पथारोहण के लिये वे इस झील को उच्च प्राथमिकता देते हैं।

बद्रीनाथ यात्रा के दौरान सतोपंथ झील के दर्शन मन को एक अद्भुद शांति प्रदान करते हैं। पौराणिक मान्यताआें के अनुसार जब पांडव स्वर्ग जाने के लिए इस रास्ते पर निकले तो वहां रहने के लिए कोई साधन नहीं है। थक जाने के कारण भीम ने स्वर्ग जाने के लिए मना कर दिया और पानी के लिए जहां तीर से स्त्रोत किया। तब इस स्थान पर झील बन गई। यह सतोपंत का केंद्र बिन्दु माना जाता है। झील का पानी एक दम स्वच्छ और पवित्र है।
सतोपंथ झील के बारे में स्कन्द पुराण में वर्णन है कि इस तिकोनी झील के तीनों कोनों पर क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु व महेश का वास है। मान्यता है कि हर साल सितम्बर माह की एकादशी के दिन ब्रह्मा, विष्णु व महेश एकसाथ इस झील में स्नान करते हैं, इसलिये उस दिन इसमें स्नान करने का विशेष महातम्य है। लेकिन, एकादशी पर सतोपंथ झील में स्नान करने वालों में विदेशी यात्रियों की तादात ज्यादा रहती है।

सतोपंथ में स्वच्छता अभियान

धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि सतोपंथ में जब तक निर्मलता व स्वच्छता रहेगी तभी तक वहां स्थित झील का पुण्य प्रभाव रहेगा। एडवेंचर ट्रैकिंग जोशीमठ के टूर आपरेटर संजय कुंवर का कहना है कि सतोपंथ के धार्मिक महत्व को देखते हुये वहां यात्रियों को रात्रि विर्शाम नहीं करना चाहिये। यात्रियों को सतोपंथ से पहले वाले पड़ाव चक्रतीर्थ से ही झील तक आवाजाही करनी चाहिये।अलौकिक अनुभव लेकर लौटा बैंजामिन उर्फ बेयर

मैक्सिको के एक छोटे शहर का निवासी बैंजामिन उर्फ बेयर वर्ष 2010 में बदरीनाथ दर्शन के लिये आया था। इस दौरान वह वसुधारा ट्रैकिंग रूट पर घूमने निकला तो उसकी मुलाकात एक कनाडियन साधवी से हुई, जिसने उसे सतोपंथ के आध्यात्मिक महतव को समझाया। बैंजामिन वापस अपने देश लौटा तो उसे अक्सर सपनों में सतोपंथ झील दिखाई देने लगी। उसने प्रण कर लिया कि वो भविष्य में सितम्बर माह की एकादशी को सतोपंथ जाकर झील में स्नान करेगा। विगत एक सितम्बर को बैंजामिन (24 वर्ष) अपने पिता के साथ फिर से बदरीनाथ पहुंचा। ट्रैकिंग शूरे करने से पहले उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। बदरीनाथ मंदिर में कुछ दिन योग-ध्यान करने के बाद बैंजामिन को स्फूर्ति प्रदान हुई और फिर 5 सितम्बर को ट्रैकिंग शुरू कर एकादशी के मुहूर्त पर 8 सितम्बर को वह सतोपंथ पहुंचा। झील में पवित्र स्नान करने के बाद वो स्वदेश लौटा। जाते-जाते बैंजामिन साथ में स्नान करने वाले यात्रियों को अपने अलौकिक अनुभव साझा कर गया। वह जल्द लौट कर आने का वादा कर गया है।

यूं तो उत्तराखण्ड के सीमांत जनपद चमोली में शानदार ट्रैकिंग रूट्स की भरमार है लेकिन माणा-स्वर्गारोहिणी की बात ही कुछ और है। पथरीले ग्लेश्यिरों को पैदल नापते हुये स्वर्गारोहिणी पहुंचना हर किसे के बूते में नहीं। बुलंद हौसले वाले पथारोही ही इस रूट को फतह कर पाते हैं। जिस सतोपंथ झील का जिक्र हम कर रहे हैं वह भी इसी ट्रैकिंग रूट पर स्थित है।

देश के अंतिम सरहदी गांव माणा से शुरु होने वाली 25 किलोमीटर लम्बी इस यात्रा में चमतोली, लक्ष्मीबन, सहस्त्रधारा, चक्रतीर्थ नामक पौरांणिक स्थलों से होकर सतोपंथ पहुंचते हैं। इसके बाद अंतिम पड़ाव स्वर्गारोहिणी की सीढियां हैं, जहां से पांडवों के बड़े भाई युधिष्ठर (अपनी देह सहित) एक विमान से स्वर्ग गये थे। इस पूरे ट्रैक में सतोपंथ झील अधिकांश सैलानियों का पसंदीदा पड़ाव है, लेकिन उसके आसपास कैंपिंग स्थल की कमी से ट्रैकरों को बुरी तरह खलती है। जिसके चलते अक्सर यात्री दलों को सतोपंथ से पहले पड़ाव चक्रतीर्थ में ही रात्रि विर्शाम के लिये लौटना पड़ता है। हालांकि, स्थानीय लोगों द्वारा सतोपंथ की पवित्रता कायम रखने के लिहाज से वहां रात्रि विर्शाम ने करने की सलाह भी पर्यटकों को दी जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आधुनिकता के दौर में जहां हम लोग प्राचीन मान्यताओं और अपने धर्मग्रन्थों को नजरअंदाज कर रहे हैं वहीं विदेशी यात्रियों को सतोपंथ में आज भी आध्यात्मिक शांति एवं कुछ अलग तरह की अनुभूतिंया हो रही हैं।

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