…अंजामे ‘गुलिस्तां’ क्या होगा ?

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एक सवाल तो उत्तराखण्ड को लेकर रह रह कर उठने लगा है कि आखिर उत्तराखण्ड का होगा क्या ? राजनैतिक नेत्तृत्व अराजक सिस्टम के आगे पूरी तरह लाचार नजर आने लगा है l

दुर्भाग्यपूर्ण यह कि राज्य हित ना प्राथमिकता है ना ही मुद्दा l राज्य हित तो एक ‘टर्म’ भर हैl जिसका इस्तेमाल मुख्यमंत्री से लेकर बाबू तक, सियासी दलों से लेकर अन्दोलनकारी संगठन, कर्मचारी संघ, सब अपने हित और जरूरत के हिसाब से इस टर्म का इस्तेमाल करने में लगे हैं l अब शासन व्यवस्था को ही लो इन दिनों प्रदेश की सियासत में दो नाम ओम प्रकाश और मृत्युंजय मिश्रा खासे चर्चाओं में हैं।

नौकरशाह ओम प्रकाश को सत्ता का पावर सेंटर बताया जा रहा है तो मृत्युंजय मिश्रा को उनकी छत्रछाया में फलने-फूलने वाला अधिकारी। इसी जुगलबंदी में एक नाम सचिवालय संवर्ग के अधिकारी जीबी ओली का भी है। इनके बारे में खास यह है कि इन पर ओम प्रकाश जी के तरह ये साहब भी मृत्युजंय मिश्रा के मोहपाश में हैं । उससे भी अहम यह कि पावर में कोई भी हो मुत्युंजय की तरह पावर में रहने के यह भी सिद्धहस्त हैं , विवादों से इनका नाता भी कम नहीं l

मुत्युंजय की चर्चा के बीच अोली का जिक्र सिस्टम की दोहरी चाल को लेकर बेहद प्रासंगिक हो चला है l बहरहाल, मुत्युंजय मिश्रा की बात की जाए तो सचिवालय कर्मी दिनों उनका यह कहते हुए विरोध कर रहे हैं, कि वे सचिवालय संवर्ग के अधिकारी नहीं हैं, लिहाजा उन्हें सचिवालय में दफ्तर उपलब्ध नहीं करवाया जाना चाहिए। लेकिन हैरानी की बात है कि जीबी ओली के मामले में सचिवालय कर्मी चुप्पी साधे हुए हैं।

सचिवालय संवर्ग के अधिकारी जीबी ओली को सचिवालय से बाहर के महकमे में भी महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठाया गया है। जीबी ओली ही नहीं, बल्कि सचिवालय संवर्ग के ऐसे तकरीबन आधा दर्जन के करीब अधिकारी और हैं, जो अन्य महकमों में शीर्ष पदों पर बैठाए गए हैं। सवाल उठता है कि क्या सचिवालय कर्मियों को इसके विरोध में भी आवाज नहीं उठानी चाहिए?

क्या उन्हें यह नहीं मानना चाहिए कि जिस तरह सचिवालय में संवर्ग से बाहर के व्यक्ति की तैनाती गलत है उसी तरह सचिवालय संवर्ग के अधिकारियों का अन्य पदों पर बैठाना भी गलत है? इस बात को जानते समझते हुए भी यदि सचिवालय कर्मी केवल मिश्रा की तैनाती का ही विरोध कर रहे हैं तो यह खालिस सुविधावादी विरोध नहीं तो फिर क्या है ?

इसे व्यवस्था में सुधार के पक्ष में किया जाना वाला विरोध तो कतई नहीं माना जा सकता। जहां तक जीबी ओली के सेवा काल की बात है तो सचिवालय संवर्ग के तहत होने वाली पदोन्नति की अधिकतम श्रेणी, यानी अपर सचिव के पद पर वे पहुंच चुके हैं। मगर प्रमोशन और रसूख की भूख देखिए कि इन साहब की नजरें सचिवालय संवर्ग से बाहर के महकमों तक पहुंची हुई हैं। वर्तमान में ओली मुख्यमंत्री के अपर सचिव और आईएएस अधिकारी ओम प्रकाश के स्टाफ अफसर होने के साथ-साथ मत्स्य विभाग के डायरेक्टर भी हैं।

यानी सचिवालय संवर्ग के साथ-साथ बाहरी महकमो में भी उनकी पूरी धमक है। सवाल यह है कि एक अधिकारी का तीन-तीन पदों पर रहना कितना तर्कसंगत है, वह भी तब जब तीनों जिम्मेदारियां अलग-अलग प्रकृति की हैं?कुछ तो ऐसा है जिसकी पर्देदारी हो रही है, सिस्टम में पावरफुल कोई ऐसे हो नहीं होता l

एक अधिकारी जो मुख्यमंत्री का अपर सचिव भी हो, नौकरशाह का स्टाफ अफसर भी हो, किसी महकमे का निदेशक भी हो और तीनों ही जिम्मेदारियों को कुशलतापूर्वक निभा रहा हो, यह कैसे संभव हो सकता है? क्या यह किसी खास अधिकारी को खास मकसद से मजबूत बनाने के उपक्रम के सिवा कुछ और है?

ऐसे अधिकारियों की प्रदेश में अच्छी खासी सूची है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इसका विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं l बेहतर होता कि अच्छा कि जिस तर्क के साथ मृत्युंजय मिश्रा का विरोध हो रहा है, उसी तर्क पर अोली एवं अन्य का भी विरोध होता l यह दोहरा रवैया नहीं तो क्या है , सवाल यह है कि इस दोहरे रवैये पर लगाम कौन लगाएगा? ताजा हालात पर तो दुष्यंत की पंक्तियां जेहन में आती हैं “हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा.. “

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