गौरी सावंत : एक ट्रांसजेंडर से मां बनने तक का सफर

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हाल ही में विक्स का नया ऐड आया है. जिसमें एक बच्ची अपनी ट्रांसजेंडर मां की कहानी बता रही है. ये बच्ची है गायत्री और मां हैं गौरी सावंत। यह कहानी कोई काल्पनिक नहीं बल्कि गौरी सांवत की असली कहानी है।

जानिए कौन है गौरी सांवत

गौरी सावंत ट्रांसजेंडरों की सेहत अच्छी रखने के लिए काम करती हैं. मुंबई में उनकी संस्था ‘सखी चार सउघी ट्रस्ट’ एड्स पीड़ितों को जागरूक करती है. वो मलाड में रहती हैं. उन्होंने गायत्री को तब गोद लिया था जब वो 6 साल की थी. उसकी असली मां एक सेक्स वर्कर थी और एचआईवी-एड्स से मर गई थी. गौरी उसे घर ले आईं, वो पास के ही एक स्कूल में जाने लगी. गौरी के ट्रांसजेंडर दोस्त उसको खूब लाड़ करते थे. गायत्री जब छोटी थी तो उसे किसे अंकल बोलना है और किसे आंटी, इसमें कंफ्यूज हो जाती थी. एक दिन गायत्री का स्कूल में किसी से झगड़ा हो गया. वो परंपरागत ट्रांसजेंडर्स की इमेज की तरह ताली बजा-बजाकर लड़ने लगी. उसी दिन गौरी ने सोच लिया था कि गायत्री को यहां से दूर बोर्डिंग स्कूल में भेजना है. गायत्री को पुणे भेज दिया गया. अब वो छुट्टियों में ही घर आ पाती है.

 

 
गौरी खुद भी ‘हिजड़ा’ नहीं बनना चाहती थीं. जब वो जवान हो रही थीं, उन्हें मालूम चल गया था कि वो लड़का नहीं लड़की हैं. उन्होंने अपना जेंडर चेंज करवाया. लेकिन एक बात उनके दिमाग में बिल्कुल साफ थी कि उन्हें भीख नहीं मांगना, उन्हें वेश्यावृत्ति नहीं करनी. उन्होंने नौकरी करनी शुरू कर दी. ट्रांसजेंडर लोगों को कॉन्डोम बांटना और उनका हेल्थ-चेकअप करवाना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे लोग उन्हें पहचाने लगे. उनका पार्टनर भी उनके इस नेक काम में भरपूर साथ देता है. गौरी अपनी बच्ची के साथ अपने छोटे से परिवार में बहुत खुश हैं. गौरी को बस एक बात का मलाल है कि उनके पापा ने उन्हें कभी अपनाया नहीं.

गौरी चाहती हैं कि उनकी बच्ची बड़ी होकर पुलिस या डॉक्टर बने लेकिन उनकी बिटिया वकील बनना चाहती है. क्योंकि उसको लगता है, उसकी मां जैसा कोई नहीं. जब उसकी मां सबके लिए इतना सब कुछ करती है तो इस देश में उसको बाकियों के बराबर हक क्यों नहीं मिलता. वो बड़ी होकर उसको उसका सम्मान और हक दिलाना चाहती है. वो ट्रांसजेंडरों को मेनस्ट्रीम में लाने की लड़ाई लड़ना चाहती है.

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