सीस्मिक गैप बनेगा भारत में बड़े भूकंप और विनाश का कारण

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देहरादून: भारत में लंबे समय से बड़ा भूकंप नहीं आया है। इसे वैज्ञानिक सिस्मिक गैप कहते हैं। यह गैप टेंशन बना हुआ है। कारण की इसके कारण बड़ा भूकंप की संभावना रहती है और यह तबाही मचा सकती है।
भूकंप के लिहाज से पूरा हिमालयी क्षेत्र संवेदनशील है। यहां भूगर्भ में टेक्टोनिक प्लेटों में लगातार तनाव की स्थिति है, जिससे ऊर्जा निकलती रहती है। यही ऊर्जा भूकंप के रूप में बाहर आती है। यानी धरती के भीतर ऊर्जा जितनी अधिक मात्रा में संचित होगी, भूकंप का अंदेशा उतना ही अधिक रहेगा।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों की मानें तो कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) व बिहार के विशाल भूकंप के बाद अब तक कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। ऐसे में कभी भी सात या आठ रिक्टर स्केल तक का भूकंप आ सकता है।

वाडिया संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुशील कुमार के अनुसार नेपाल में 25 अप्रैल 2015 को 7.8 रिक्टर स्केल के भूकंप से 81 साल पहले यहां आठ रिक्टर स्केल का भूकंप आ चुका है। इस आधार पर माना जा सकता है कि इस दौरान संचित हुई ऊर्जा काफी मात्रा में बाहर आ चुकी होगी।

जबकि, भारतीय क्षेत्र में कांगड़ा में वर्ष 1905 में आए 7.8 रिक्टर स्केल और बिहार में वर्ष 1934 के आठ रिक्टर स्केल के भूकंप के बाद अब तक कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। वैज्ञानिक भाषा में इसे सिस्मिक गैप कहा जाता है। भूकंप न आने को इस दृष्टि से भी देखा जाता है कि भूगर्भ में ऊर्जा संचित हो रही है। हालांकि यह कब बाहर आएगी, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

हर रिक्टर स्केल के साथ भूकंप की क्षमता में 10 गुना का इजाफा हो जाता है। जबकि, भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा में 31 गुना तक का इजाफा होता है। हालांकि ऊर्जा का ग्राफ हर भूकंप के हिसाब से कम ज्यादा होता रहता है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने भूकंप की जानकारी वी-सैट के माध्यम से रियल-टाइम (तत्काल) प्राप्त करने के लिए उत्तराखंड समेत हिमाचल प्रदेश में 10 सिस्मोमीटर व पांच एक्सेलेरोग्राफ लगाए हैं।

रुद्रप्रयाग में आया यह पहला ऐसा बड़ा भूकंप था, जिसके रियल टाइम डाटा का प्रयोग वैज्ञानिकों ने किया। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. एके गुप्ता के अनुसार एक साल के भीतर 10-10 सिस्मोमीटर व एक्सेलेरोग्राफ और लगाए जाएंगे।

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