'लीडर' इधर, 'कैडर' उधर

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_ कहीं नेताओं और कार्यकर्ताओं की अदला-बदली में बाजी न मार ले जाएं हरीश

देहरादून। उत्तराखण्ड में ‘कमल’ खिलाने के लिये भाजपा में एक खास मिशन चल रहा है। कांग्रेस के नेताओं को भगवा चोला पहनाया जा रहा है। इस मिशन में एक के बाद एक मिल रही कामयाबी से भाजपा में ‘बड़ों’ के पैर जमीन पर नहीं हैं, जबकि ‘छोटे’ हैरान हैं।

कार्यकर्ताओं को समझ नहीं आ रहा कि पार्टी सत्ता पाने को अचानक इतनी उतावली क्यों हो गई कि उसने अपनी रीति-नीति भी बदल डाली है। टिकट बंटवारे में, दशकों तक पार्टी के झण्डे-डण्डे बोकने वाले कार्यकर्ताओं की दावेदारी को दरकिनार कर घण्टों पहले भाजपा में आने वाले दागी-बागी कांग्रेसियों को तरजीह दी जा रही है।

पार्टी में अब ‘सुचिता और अनुशासन’ का सिद्धांत बीते जमाने की बात लगने लगा है। ये बात दूर तक गई तो भाजपा का पूरा ‘कैडर’ हिलता दिखने लगा। हार्डकोर भाजपाई प्रदेश कार्यालय में धरने पर बैठ गऐ हैं तो बाकी सोशल मीडिया में भड़ास निकाल रहे हैं। बहुत संभव है कि ‘लीडर’ और ‘कैडर’ की अदला-बदली में हरीश रावत फिर से बाजी न मार ले जाएं।

बीते 18 मार्च को उत्तराखण्ड की सियासत ने करवट लेनी शुरू की। उस वक्त विधानसभा में बजट सत्र चल रहा था। बजट पर ध्वनिमत से वोटिंग हो रही थी तो कांग्रेस के नौ विधायक अचानक विपक्ष के साथ खड़ हो गये। इसके बाद सिलसिलेवार कुछ घटनाक्रम हुए, जिनके आधार पर केन्द्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा तो 55 दिन बाद हरीश सरकार बहाल हो गई।

हालांकि इसी दरम्यिान कांग्रेस की एक और विधायक रेखा आर्य भाजपा के खेमे में चली गई। उस वक्त शुरु से अंत तक जो राजनैतिक घटनाक्र रहा उसमें फौरी तौर पर मुख्यमंत्री हरीश रावत जनता की संवेदनाएं हासिल करने में कामयाब रहे। उस समय यहां तक कहा गया कि हरीश यदि विधानसभा भंग कर तत्काल चुनाव करवा लें तो उनकी सरकार बहुमत के साथ सत्ता में लौटेगी।

इसके बाद भाजपा नेताओं और भाजपा में शामिल हुए बागी कांग्रेसियों ने एक आक्रामक रणनीति के तहत स्टिंग समेत तमाम आधार पर सीएम हरीश पर चौतरफा हमले जारी रखे। अब जबकि राज्य में चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, भाजपा 70 में से 64 उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुकी है तो सियासत में फिर से हचलच दिखने लगी है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य और उनके पुत्र को भाजपा ने सिर्फ गले लगा लिया बल्कि लगे हाथ कुछ ही घण्टों में दोनों को टिकट भी दे दिया। इतना ही नहीं वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता एनडी तिवारी भी भाजपा के साथ सिर्फ इसलिये खड़े हो गये क्योंकि अमित शाह ने उनका टिकट भी कंफर्म कर दिया।

अभी तक भाजपा ने जो 64 उम्मीदवार घोषित किए हैं उनमें से 13 हाल ही में कांग्रेस से आये नेता हैं। यानि, इन 13 सीटों पर भाजपा ने वर्षों से संगठन की सेवा कर रहे अपने नेताओं की दावेदारी को सिरे से खारिज कर दिया। भाजपा की पहली सूची जारी होते ही 38 (आधे से ज्यादा) सीटों पर कार्यकर्ताओं में असंतोष के स्वर फूट गये।

कार्यकर्ताओं का ज्यादा गुस्सा हाल ही में भाजपा ज्वाइन करने वाले बागी विधायकों को टिकट देने की वजह से है। पार्टी के देहरादून स्थित प्रदेश कार्यालय में हर रोज किसी न किसी सीट के कार्यकर्ता धरना देने पहुंच रहे हैं। भाजपा के कई तेज तर्रार नेता भी सोशल मीडिया पर हाईकमान के प्रति अपनी भड़ास निकाल रहे हैं।

कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि भाजपा की रीति नीति में अचानक ऐसा बदलाव क्यों किया गया। अपने कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बाहरी नेताओं का रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत करने की जरूरत क्या थी। कई आम लोग भी भाजपा के बदले चाल चरित्र पर सवाल उठाते हुये हरीश रावत के पक्ष में टिप्पणियां कर रहे हैं।

जो हालात बने हैं उनसे संकेत मिल रहे संकेत भाजपा के लिये शुभ नहीं हैं। ‘लीडर’ भले ही भाजपा में बढ़ रहे हों पर पार्टी का ‘कैडर’ सरकता नजर आ रहा है। ऐसे में चुनाव के परिणाम हरीश रावत के पक्ष में आएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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