चुनाव तक कहीं सीन से गायब न हो जाएं पीके

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दीपक फरस्वाण

_ हरीश को ब्रांड बनाने की जिम्मेदारी ली पर सिर्फ रस्मअदायगी के तौर पर शुरू किया काम

देहरादून। अपनी खास चुनावी रणनीति के लिये पहचाने जाने वाले प्रशांत किशोर (पीके) उत्तराखण्ड में आए और चले भी गए। दो दिन तक पीके को लेकर जो शोर मचा रहा वो फिलहाल धीमा पड़ चुका है।

कहीं ऐसा न हो कि चुनाव तक पीके सीन से गायब हो जाएं। जिस तरीके से पीके ने उत्तराखण्ड में अपना काम शुरू किया वो बस रस्मआदयगी सा लग रहा है। जबकि, उनका काम करने का स्टाइल एकदम अलग है।

वह खास योजना के तहत काम करते हैं। उन्होंने गुजरात में मोदी के साथ काम किया तो वह उनके गांधीनगर स्थित घर में डेरा डाले रहे। नीतिश के साथ काम किया तो पटना में उनके ही आवास में डट गए, पर उत्तराखण्ड में वह आये और अपनी टीम को यहां छोड़कर चले गये। जिस तरह से उनकी रणनीति होती है, उसके हिसाब से तो मौजूदा समय में उनकी मौजूदगी हरीश रावत के आवास बीजापुर हाउस में होनी चाहिए थी।

चुनावी चाणक्य प्रशांत किशोर का काम करने का अपना अलग ही अंदाज है। कहा जाता है कि मोदी को मुकाम तक पहुंचाने में उनका भी अहम योगदान है। प्रशांत वर्ष 2011 के अंत में मोदी से जुड़े।

उस वक्त जब उन्होंने मोदी के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी उठाई उसी दिन से वह मोदी के साथ गांधीनगर स्थित उनके आवास में रहने लगे। साये की तरह साथ रहकर उन्होंने पहले मोदी को समझा और फिर उन्हें ब्रांड बनाकर जनता के सामने पेश किया। इसके प्रचार-प्रसार में उन्होंने आधुनिकतम तकनीकियों का इस्तेमाल किया।

लोकसभा चुनाव में मोदी को अप्रत्याशित सफलता मिली तो पीके भी सुर्खियों में आ गए। चारों ओर चर्चा हुई कि पीके चुनाव जिताने में माहिर हैं। फिर क्या था नेताओं में उन्हें हायर करने की होड़ सी मच गई। बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश जैसे जमीनी और लोकप्रिय नेता को इस चुनावी चाणक्य को सहयोग लेना पड़ा।

पीके कई महीनों तक पटना स्थित नीतीश के घर में डेरा डाले रहे। वहीं से उन्होंने नीतीश के प्रचार प्रसार का ताना बाना बुना। नीतीश को सफलता मिली तो पीके पर नेताओं का विश्वास और बढ़ गया।

जो कांग्रेस पहले पीके को हायर करने को लेकर मोदी पर निशाना साधती थी, अब उसके युवराज ने भी पीके को अपना चुनावी गुरू बना लिया है। राहुल के निर्देश पर ही पांच राज्यों जहां विधानसभा चुनाव घोषित हो गए हैं, में से दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश व पंजाब में चुनावी प्रचार की जिम्मेदारी पीके को ही सौंपी गई थी।

इधर, ओपीनियन पोल ने उत्तराखण्ड में कांग्रेस की हवा खराब कर दी। सीएम हरीश भी घबरा गए। उनके आग्रह पर आनन फानन में पीके को ही उत्तराखण्ड में कांग्रेस के चुनावन प्रचार की कमान सौंप दी गई। पीके कुछ दिनो पहले देहरादून आऐ। कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं से मिले और अपनी टीम को यहां छोड़कर चले गये। जबकि पीके की खासियत यह है कि वह कभी पूरी पार्टी का प्रचार प्रसार नहीं करते बल्कि उसके एक नेता का इस कदर प्रचार कर देते हैं कि उसे ही ब्रांड बना देते हैं।

लेकिन, ऐसा करने से पहले वह सम्बंधित नेता के घर डेरा डालकर साये की तरह उसके साथ रहते हैं। उसके आचार व्यवहार को समझते हैं और फिर अपनी प्लानिंग तैयार करते हैं। लेकिन, उत्तराखण्ड में अभी तक उन्होंने ऐसा नहीं किया। हो सकता है हरीश को हिट बनाने की जिम्मेदारी उन्हें देर से मिली, शायद इसलिये उनकी रणनीति बदली हो। लेकिन, जिस तरह उत्तराखण्ड में मतदान होने में महज 35 डेज बचे हों, तो देखना होगा कि पीके यहां कोई गुल खिला भी पाएंगे या फिर खुद सीन से गायब हो जाएंगे।

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